Tuesday, October 20, 2015

बाबूजी का चश्मा

`कथाक्रम' के अप्रैल-जून २०१५ के अंक में छपी और सराही गई मेरी नई कहानी...


         
                                     
     सुबह के नौ बजे थे। आलोक ऑफ़िस चले गए थे और आशू कॉलेज...। मैं खाली होकर सोच रही थी कि आज घर के कुछ एक्स्ट्रा काम निपटाऊँगी। कई महीनों से टाँड़ पर रखे बर्तनों को नहीं देखा। उनकी साफ़-सफ़ाई करके जो पुराने और बेकार होंगे, उन्हें बेचने के लिए अलग रख दूँगी। बेकार सामान घर में रख कर काम का बोझ बढ़ाना ही होता है। नवीन मार्केट का कुमार बर्तनवाला पुराने बर्तनों के भी अच्छे दाम लगा देता है...। इसके अलावा बरामदे के एक कोने में रद्दी अख़बारों का भी ढेर लग गया है...। इसे भी आज ही निपटा देती हूँ...। एक दिन बस इतना ही...।
     पर शुरू कहाँ से करूँ? टाँड़ की सफ़ाई से या रद्दी को इकठ्ठा करने से...सोच ही रही थी कि तभी फोन की घण्टी घनघनाई।
     मन झल्ला गया। जब भी घर की कुछ एक्स्ट्रा सफ़ाई का सोचती हूँ, कहीं-न-कहीं बाधा पद ही जाती है। रोज़मर्रा के काम के अलावा महीने-दो महीने में में पूरे घर के रेशे-रेशे की साफ़-सफ़ाई न करो तो घर कबाड़खाना लगने लगता है। अकेले अपने लोगों के बीच तो चल जाता है, पर अचानक किसी खास के आ जाने पर जो शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है, उससे तो भागते भी नहीं बनता।
     फोन की घण्टी अब भी टिनटिना रही थी। कौन हो सकता है? अभी कल ही अम्मा के घर से होकर आई हूँ...वहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक ही था, फिर कौन...?
     बेमन से रिसीवर उठा कर जैसे ही कहा,"हैल्लोऽऽऽ...कौन...?" वैसे ही उधर से अम्मा की रुँधी हुई आवाज़ थी,"बिट्टीऽऽऽ...अभी ही घर आ जा...बाबूजी फिर सनक गए हैं। खाना-पीना छोड़ कर धूनी रमाए बैठे हैं...किसी से सम्हल नहीं रहे हैं...।"
     जब बाबूजी नौकरी में थे तब ज़िन्दगी कितनी खुशहाल थी पर उनके रिटायरमेण्ट के बाद? सब कुछ किस तरह उलट-पुलट गया...। कोई समझ नहीं पा रहा था या यूँ कहें कि समझना नहीं चाहता था और अब...?
     सुनते ही मैने रिसीवर रखा और फिर जल्दी से थोड़ा बहुत समेट कर अम्मा के यहाँ पहुँच गई। गेट के बायीं तरफ़ बाबूजी का कमरा था पर उस समय वह खाली था। रिटयरमेण्ट के बाद बाबूजी उस कमरे में कम ही बैठते थे। उनके कमरे के सामने ही बड़ा सा हॉल था, जिसमें बाबूजी ने डाइनिंग टेबिल के सामने ही एक तख़्त डलवा ली थी। जब सब लोग टेबल पर खाना खाते तब बाबूजी भी इसी तख़्त पर बैठ कर आराम से खाते। मेरे अन्दर घुसने के दौरान भी बाबूजी इसी तख़्त पर पालथी मार के बैठे थे। मुझे देखते ही वे ताली बजा कर हँसे,"बिट्टो आ गई...। लो देखोऽऽऽ...बिट्टो आ गई...।"
     मैं सन्न...अवाक...। बाबूजी तो अच्छे-भले दिख रहे थे पर डाइनिंग टेबल का सत्यानाश हो गया था। टेबल क्या था, उसे पूरी तरह से एक बगीचे का रूप दे दिया गया था। बाहर लॉन में जितने भी गमले थे, सब लाकर टेबल के किनारों पर लगा दिए गए थे...। बीच में भगवान की चार-पाँच मूर्तियाँ थी, जिन पर गेंदे की माला और फूल चढ़े थे। उसके एक किनारे पिछली जन्माष्टमी पर लाया गया भगवान का झूला था, जिसमें बालगोपाल विराजमान थे और झूले की डोरी बाबूजी के हाथ में थी।
     मेरी नज़र अम्मा की ओर गई तो भीतर कुछ चटक-सा गया। अपने समय में अम्मा बेहद दबंग किस्म की स्त्री मानी जाती थी। नौकर-चाकर से लेकर हम सब बच्चे तक उनसे काँपते थे...। वे कोई जल्लाद नहीं थी। उनका यह बाना सिर्फ़ घर व बच्चों को चुस्त-दुरुस्त रखने तक ही सीमित था, वरना उनके अन्दर ममता का एक ऐसा समन्दर था जिसकी थाह पाना मुश्किल था। यह मैने तब नहीं जाना था पर बाद में आशू के होने पर महसूस किया था, माँ को अपने भीतर की गहराइयों तक...पर आज...? यह माँ का कौन सा रूप था? अशक्त हथेलियों पर अपनी ठोडी टिकाए असहाय-सी दिखती अम्मा गहरी चिन्ता में थी। किसी वजह से आज सब घर पर थे और रह-रह कर अपनी हँसी रोक नहीं पा रहे थे। मुझे देख कर अम्मा ने बाबूजी की ओर इशारा किया तो उन्हें देख कर मेरी अजीब सी हालत हो गई। बाबूजी ने माथे पर चन्दन का एक बड़ा-सा तिलक लगा रखा था और जाने कब अपने ही हाथों से अपने बालों को काट कर महीन रेशों की शक्ल दे दी थी।
     बाबूजी का यह रूप देख कर मुझे भी हल्की-सी हँसी आने को हुई कि तभी उनकी कातर आवाज़ मुझे अन्दर तक भिगो गई,"बिट्टोऽऽऽ...ये लोग मेरा चश्मा नहीं दे रहे हैं...। मुझे भगवान का बगीचा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है...। मैं वहाँ जाऊँ तो कैसे...?"
     फिर दूसरे ही क्षण वे ठहाका मार कर हँसे,"यह देखो...कैसा लग रहा है...? सुन्दर है न...? मैने बनाया है...खुद अपने हाथों से...। तुम लोग बेकार में माली को बुलाते हो...पैसा लगता है न...। वो पैसा मुझे दे दो...।"
     मुझसे कुछ कहते नहीं बन रहा था। आँखों से सहसा ही चलक पड़ने को आतुर कुछ बूँदों को मैने अपनी हथेलियों में ही समेटा और फिर बाबुजी की बगल में बैठ कर उनकी आँखों पर चढ़े सुनहरे फ़्रेमवाले चश्मे को हाथ लगा कर कहा,"बाबूजी, चश्मा तो आप पहने हैं...। ये देखिए...।"
     "नहीं, यह नहीं...इससे मुझे भगवान का घर नहीं दिखता। मुझे तो वो वाला चाहिए जो तुमने दिया था...। यह गन्दा है। भगवान के घर कितने फूल खिले हैं...। भगवान कहाँ खड़े हैं, ये तो इससे दिखता ही नहीं...।" फिर अचानक ही चश्मा प्रकरण को भूल कर बोले,"सुनो बिट्टोऽऽऽ...तुम्हारे पास ढेर सारे बर्तन हैं न...और छुरी-काँटा भी...। मुझे दे देना...विष्णु भगवान काँटे-चम्मच से खाते हैं न...।"
     सारे भाई-बहन ठहाका मार कर हँस पड़े और साथ में बाबूजी भी...पर जाने क्यों मेरी आँखें भर आई,"बाबूजी, पहले आप खाना खा लीजिए। कल हम भगवान जी के लिए नए बर्तन ले आएँगे...।"
     "और मेरा चश्मा...?"
     "हाँ-हाँ...आपका चश्मा मैं ढूँढ दूँगी। आप परेशान मत होइए...ठीक...?"
     "ठीक...।" बच्चों की तरह सिर हिला कर बाबूजी ने कहा तो मैने अम्मा को इशारा किया। वे तुरन्त दौड़ कर उनकी थाली ले आई। मैने अपने हाथों से कौर लगा कर उन्हें पूरा खाना खिलाया। इस दौरान वे एक मासूम बच्चे की तरह कौर निगलते हुए भगवान को झूला झुलाते रहे। खाने के बाद मैने पानी में घोल कर बाबूजी को नींद की गोली भी खिला दी। नींद में भी बाबूजी के हाथ में झूले की डोरी थी और गहरी नींद में सोते हुए वे खुद भी किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लग रहे थे।
     अब बाबूजी के पास सिर्फ़ मैं और अम्मा थे, बाकी सब अपने अपने कमरों में चले गए थे, ऊबे हुए से...। भीतर जाते समय निखिल बड़बड़ाना नहीं भूला,"इनका तो रोज़ का नाटक है। जीना हराम हो गया है...। अरे, दिमाग़ खराब है तो अस्पताल में भर्ती करो...पर मेरी कोई सुनता भी है क्या...उफ़्फ़...!"
      अम्मा रो रही थी,"क्या करूँ बिट्टो, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कभी बेवजह रोने लगते हैं तो कभी किसी से बतियाते हुए हँसने लगते हैं...। अब इधर ही देखो, उस चश्मे के पीछे ही पड़ गए हैं जो ऑपरेशन के बाद तूने इन्हें दिया था।"
      "पर वह चश्मा गया कहाँ?"
     "मुझे क्या पता...कहीं खुद ही रख कर भूल गए हैं। हर जगह ढूँढ लिया है...मिल ही नहीं रहा है...। एक ये वाला चश्मा है, पर नहीं...बच्चों की तरह ज़िदियाए हैं...वही चश्मा ही चाहिए...।"
     "और यह भगवान की क्या बात है? एक दो महीनों से देख रही हूँ, बाबूजी भगवान के बारे में ढेर सारी बातें करते हैं...।"
     "अम्मा खुद चकित थी। जवानी के दिनो में पूजा-पाठ को कभी तवज़्ज़ो न देने वाले बाबूजी अचानक भगवान के बारे में इतनी बातें कैसे करने लगे? अम्मा बताते हुए थोड़ा मुस्कराई भी,"इनसे बात करने बैठो तो बस वही भगवान की बातें...। कभी गणेश भगवान की बातें तो कभी विष्णु भगवान की...। और तो और...मथुरा-वृन्दावन की भी सब बातें इन्हें याद हैं...। कौन-कौन साथ गया...क्या-क्या खाया-पिया...कहाँ-कहाँ घूमे...। एक-एक मन्दिर का नाम बताते हैं...। अब तू ही बता, इन्हें पागल कहूँ भी तो कैसे...?"
     मैं चुपचाप सोते हुए बाबूजी को ताक रही थी। डाइनिंग टेबल पर बना बगीचा ज्यों-का-त्यों था। कोई हटाता भी तो न हटाने देती। बाबूजी अपने आपे में थे भी या नहीं, नहीं जानती थी पर इतना सच था कि यह घर उनका था...वे जैसे चाहें, रहें...किसी को बोलने का हक़ नहीं था। वे अब भी किसी की कमाई पर नहीं पल रहे थे बल्कि पूरा घर अब भी बहुत हद तक उनकी पेन्शन के बल पर आराम से रह रहा था।
     मैने अम्मा को समझा कर चुप कराया। दूसरे दिन बाबूजी को किसी मनोचिकित्सक को दिखाने की बात कह कर घर आ गई थी। घर में भी ढेरों काम थे, पर किसी में मन नहीं लग रहा था। रह-रह कर बाबूजी का मासूम चेहरा आँखों के आगे घूम जाता। अभी सोता हुआ छोड़ कर आई हूँ, पर अगर बीच में जाग कर सनक गए तो...?
     बाबूजी का यह रूप मेरी समझ से भी परे था। अचानक उन्हें यह क्या हो गया है? दो-दो हॉर्ट अटैक झेल चुके बाबूजी कभी काफ़ी दबंग और ईमानदार लेबर कमिश्नर हुआ करते थे। उनकी नौकरी के दौरान हम भाई-बहनों ने न जाने कितने शहरों को देखा, खूब घूमे-फिरे, नौकर-चाकर का सुख देखा...और तो और, उनका भरपूर प्यार-दुलार पाया। बाबूजी ने कभी बेटा-बेटी में कोई फ़र्क नहीं समझा। हम जो चाहते, हमें मिलता। हम लोगों की सुख की ही खातिर बाबूजी ने रिटायर होने के बाद भी काम करना बन्द नहीं किया। उन्होंने लेबर-लॉ की प्रैक्टिस शुरू कर दी और कुछ ही सालों में शहर के जाने-माने लेबर लॉ एडवाइज़र में उनका नाम शुमार हो गया। इसी दौरान मेरी और दो भाइयों की शादी भी हो चुकी थी। दोनो भाई इसी शहर में अपने परिवार के साथ रहते हैं और सुख-दुख में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा देते हैं।
     सत्तर के करीब पहुँचते ही बाबूजी को दिल का दौरा न पड़ता तो वे अपनी प्रैक्टिस कभी नहीं छोड़ते, पर एक के बाद जल्दी ही दुबारा दौरा पड़ने पर डॉक्टर ने सख़्ती से उन्हें पूरा आराम करने की सलाह दी।
     डॉक्टर ने सलाह क्या दी, बाबूजी का तो जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। जो कमरा हमेशा उनके क्लाइण्ट्स से भरा रहता था, वह धीरे-धीरे खाली होने लगा और उसके साथ ही शायद बाबूजी के अन्दर भी एक खालीपन भरने लगा था, जिसे हम लोग समझ नहीं पाए थे। बाबूजी एकाकी पड़ गए थे। घर में अम्मा और छुटकी उनके ज़्यादा क़रीब थे। मैं उनकी दुलारी बेटी होने के बावजूद अपने घर में थी। कभी-कभार जाती तो बाबूजी से ढेर सारी बातें होती। उस दिन बाबूजी अपने मन की ढेरों बातें करते जिसमें भाई-बहनों की शिकायतें भी शामिल होती। किसने कब बाबूजी को क्या कहा, भूले-भटके किसी के आने पर किसने उन्हें टरका दिया, उनकी फ़ाइलों को उनसे बिना पूछे किस तरह चादर में बाँध कर टाँड़ पर फेंक दिया गया, आदि-आदि...।
     यह सब शिकायतें करते वक़्त बाबूजी का चेहरा देखते ही बनता था। ऐसा लगता था जैसे मैं उस घर की बड़ी-बूढ़ी हूँ और उनकी शिकायत पर सबको डाँट लगाऊँगी। मैं अक्सर ऐसा करती भी...। कई बार उनकी फ़ाइलों पर से गर्द झाड़ कर उनके पलंग के पास वाली अलमारी में रख देती थी और तब बाबूजी रात-रात भर जाग कर उनका इस तरह अध्ययन करते थे, मानो दूसरे दिन किसी केस के सिलसिले में उन्हें कोर्ट ही तो जाना है...।
     मैं वहाँ चार फ़ाइलें झाड़ कर रखती तो कुछ दिनों में उनमें से दो-तीन गायब हो जाती। उनके गायब होते ही बाबूजी के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी पसर जाती। पनीली आँखों से वे मेरे या अम्मा की ओर देखते। अम्मा बेचारी क्या करती, पर मुझसे ज़्यादा बर्दाश्त नहीं होता था। भाई-बहनों की ऐसी हिमाकत...। वे रात भर जाग कर पढ़ें या दिन भर सोएँ, किसी से मतलब...? मैं पूरी ताकत से सब पर गरज-बरस पड़ी, पर उतनी ही गर्जना से दूसरी ओर से उत्तर आय़ा,"तुम्हें क्या दीदी...तुम तो बड़े आराम से अपने घर रहती हो...। यहाँ सहना तो हमें पड़ता है। सारी रात कमरे की बत्ती जला कर पागलों की तरह ज़ोर-ज़ोर से पढ़ते हैं और फिर खुद ही जिरह करने लगते हैं...। तुम कुछ समझती तो हो नहीं...वह पहले जैसे नहीं हैं...पूरे पागल हो चुके हैं...।"
     यह याशी थी, भाई-बहनों में सबसे तेज़...बेहद लड़ाका...। बाबूजी को ‘पागल’ कह कर जिस तरह उसने उनका अपमान किया था, उससे तो जी चाहा कि एक ज़ोर का थप्पड़ उसके गाल पर धर दूँ, पर सिर्फ़ सोच कर रह गई। थप्पड़ मारने का नतीज़ा एक बार भुगत चुकी हूँ। याशी ने घर पर जो बवाल किया था, उसे याद कर आज भी दुःखी हो जाती हूँ...।
     घर में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो बहुत कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। मेरा घर भी कुछ ऐसा ही हो गया था। बाबू जी के बीमार पड़ जाने के कारण इधर मेरा भी घर से जल्दी-जल्दी निकलना हो रहा था। यह तो अच्छी बात थी कि आलोक ने कभी मेरे इस तरह आने-जाने पर रोक नहीं लगाई। आशू भी सीधा ही था। खाना बना कर अक्सर मैं रख देती, तो बाप-बेटे गरम कर के चुपचाप खा लेते। उन्हें बाबूजी के बारे में पता था पर कभी ज़्यादा खोज़बीन नहीं करते थे। उन्हें अपने मायके के बारे में बताना मुझे भी पसन्द नहीं था। सबकी अपनी ज़िन्दगी और उससे जुड़ी परेशानियाँ थी, कोई कितना परेशान होता...पर वे मेरे तो बाबूजी थे...और वो भी ऐसे बाबूजी जिन्होंने काफ़ी कष्ट से अपने बच्चों की ज़रूरतों को पूरा किया था, बिना किसी को इस बात का अहसास कराए हुए...। आज जब आशू के लिए मैं कुछ ऐसा करती हूँ तो बड़ी शिद्दत से इस बात का अहसास होता है...।
     रात मेरे जागरण के बावजूद आसानी से कटी। इस दौरान मैने चार-पाँच बार अम्मा को फोन कर के बाबूजी का हाल लिया था। नींद की दवा के असर से बाबूजी खा तो कुछ नहीं पाए, बस अम्मा जो ज़बर्दस्ती, फुसला कर उन्हें दूध पिला पाई थी, वही पीकर सारी रात गहरी नींद सोते रहे...पर सुबह...?
     एकदम अल्लसुबह जैसे तूफ़ान आ गया। मैने आलोक और आशू का नाश्ता दिया ही था कि अम्मा का फोन आ गया। वह बुरी तरह रो रही थी,"बिट्टोऽऽऽ...मेरा तो जीना दुश्वार हो गया है...। कोई भी मुझसे नहीं सम्भल रहा...।"
     "क्यों, क्या हो गया...?"
     "किसी ने पता नहीं कब बाबूजी का बनाया बगीचा मेज पर से हटा दिया है। पूछने पर कोई बता नहीं रहा है। मैं क्या करूँ...? सुबह उठते ही बाबूजी को अपना बगीचा नहीं दिखा तो उन्होंने जो उत्पात मचाया कि मैं तुझसे क्या कहूँ...। गुस्से मेम पूरा घर तहस-नहस कर बिना कुछ खाए-पिए बैठे हैं...। बहुत मजबूर होकर फोन किया है...। आलोक बाबू भी क्या सोचेंगे...।"
     अम्मा फिर रोने लगी थी। मैने उन्हें आने का बोल कर फोन रखा ही था कि आलोक सामने आ गए,"क्या हो गया...? इतना परेशान क्यों हो...?"
     "कुछ नहीं...बाबूजी की हालत ठीक नहीं है...।" रोकते-रोकते भी मेरे आँसू छलक ही पड़े थे।
     "अरे...इसमें रोने की क्या बात है...? पहले बताया होता न...चलो, आज छुट्टी लेकर उन्हें डॉक्टर को दिखा देता हूँ...।"
     "नहीं...आप परेशान न होइए...। नितिन-आशीष हैं न...। ज़रूरत पड़ी तो मैं आपसे खुद कहूँगी...।"
     मैं आलोक को अपने मायके की इस स्थिति के बारे में कुछ बताना नहीं चाहती थी। उनके परिवार में सब बहुत शालीन और बड़ों का सम्मान करने वाले थे, पर मेरे यहाँ...?
     जब तक बाबूजी और अम्मा सशक्त थे, सभी शायद डर की वजह से उनका सम्मान करते थे, पर उनके अशक्त होते ही...। माता-पिता तन और मन से अशक्त हो जाएँ तो क्या बच्चों के लिए फ़ालतू हो जाते हैं? यह बात सोच कर अक्सर मैं डर जाती थी। कहीं आशू ने भी हमारे साथ यही किया तो...?
      अम्मा ने मेरे डर को दूर करने की कोशिश की थी,"बिट्टॊऽऽऽ...सारी दुनिया के बच्चे एक जैसे स्वभाव के नहीं होते। हर घर में ऊँच-नीच होती रहती है। अब अपने ही घर में देख लो। छोटी, तुम और सीमा...तीन मेरे ऐसे लायक बच्चे हो जिसने कभी हम दोनो का अपमान नहीं किया पर...।" समझाते-समझाते अम्मा रो ही पड़ी थी,"पर बाकी...? उस दिन मेरा कलेजा ही फट गया था जिस दिन आशीष ने गुस्से में कहा था...इससे तो अच्छा बाबूजी मर ही जाएँ...। इनके मरने से किसी को फ़र्क नहीं पड़ेगा...।"
     उस दिन तो मैं भी सकते में आ गई थी। कोई औलाद अपने बाप के लिए ऐसा भी सोच सकती है, पर ये दुनिया है...यहाँ कुछ भी हो सकता है...।
     आलोक और आशू चले गए तो मैं भी तैयार हो कर अम्मा के घर पहुँच गई पर ये क्या...?
     भीतर अजीब तरह की अस्त-व्यस्तता थी। डाइनिंग टेबिल पूरी तौर से साफ़ था...। सारे गमले और भगवान की मूर्तियाँ अपनी पुरानी जगह पर थी। बाबूजी का तख़्त वहाँ से उठा कर बरामदे में डाल दिया गया था और्र बाबूजी...? वे तो पहले की तरह सबसे आगे वाले कमरे में गावतकिया लगाए गुमसुम बैठे थे...। कुछ इस तरह जैसे किसी ने उनकी पूरी दुनिया ही लूट ली हो...।
     अम्मा उन्हें समझा कर हार गई थी पर वे अपने बिस्तर से किसी तरह उठने को तैयार नहीं थे। मैने भीतर झाँका, पर वहाँ भी एक अनकहा सन्नाटा पसरा था...। रसोई ठण्डी पड़ी थी...। जिसे जहाँ जाना था, अपने काम और पढ़ाई के लिए गया। छोटी और सीमा चुपचाप बैठी थी। मुझे देखा तो उठ कर पास आ गई,"तुम आ गई दीदी...अब तुम्ही सम्हालो बाबूजी को...। सुबह इस कदर तूफ़ान मचा रखा था कि सम्भाले नहीं सम्भल रहे थे...। आशीष भैया ने मारने के लिए हाथ उठाय तब कहीं जा कर चुप हुए...।"
      "क्याऽऽऽ...?" मैं लगभग चीख पड़ी थी,"उस कमीने की इतनी हिम्मत कि बीमार बाप पर हाथ उठाए...? आने दो उसे...हाथ न तोड़ दूँ उसका तो कहना...। उसने समझ क्या रखा है...? अम्मा-बाबूजी को एकदम असहाय-अकेला समझता है...? अरे, अभी मैं हूँ...किसी को उनके साथ अन्याय नहीं करने दूँगी...।"
      मेरी चीख सुन कर अम्मा दौड़ी चली आई,"चुप कर बिट्टोऽऽऽ...बात बढ़ाने से कोई फ़ायदा नहीं...। आशीष धमकाता नहीं तो ये चुप भी न बैठते...। बड़ा तूफ़ान मचा रखा था...।"
     "अम्मा तुम भी...?" मैने आश्चर्य से अम्मा की ओर देखा। अम्मा की आँखों में गबरू-जवान बेटों का अनकहा ख़ौफ़ साफ़ झलक रहा था। बाबूजी की इस हालत के चलते वे अपने को बेहद असहाय महसूस कर रही थी। अभी तीन अनब्याही बेटियाँ बैठी हुई हैं, उनका क्या होगा?
     अम्मा की आँखों में उतरे इस ख़ौफ़ और बेचारगी को देख कर मैं भी शान्त हो गई। अम्मा का डर ग़लत नहीं था। मैं तन से साथ दे सकती थी, पर बाकी काम...? घर चलाना...बहनों की शादी...हारी-बीमारी...?
     मैने डरते-डरते बाबूजी के कमरे में झाँका। बाबूजी एकदम पत्थर के बुत की तरह बैठे थे। दिमाग़ी हालत ठीक न होने के बावजूद उन्हें गहरा सदमा लगा था। जिन बाबूजी की बुद्धिमत्ता का लोग लोहा मानते थे, उन्हें बेहद सम्मान देते थे, उनकी ऐसी हालत देख कर मेरा कलेजा मानो फट-सा गया था, पर मैं कर ही क्या सकती थी, सिवाय उन्हें सान्त्वना देने के...?
     अम्मा ने मुझे भीतर जाने का इशारा किया तो मैं धीरे से जाकर बाबूजी के पास खड़ी हो गई,"बाबूजीऽऽऽ...चलिए...उठिए...मुँह-हाथ धोकर कुछ खा लीजिए...। आपने तो रात में भी कुछ नहीं खाया...।"
     प्रत्युत्तर में बाबूजी दहाड़ मार कर रो पड़े। बड़ी देर से रुका बाँध का पानी भरभरा कर पूरे वातावरण को बहा ले गया,"बिट्टोऽऽऽ, तू आ गई...। देखोऽऽऽ...ये लोग मुझे मारते हैं...। मैं कमज़ोर हो गया हूँ न...।"
     अपने संघर्ष भरे दिनों में भी कभी न हारने वाले बाबूजी इस कदर टूट जाएँगे, मैने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, पर आज...?
     मैने अपने को तो सम्भाल लिया पर माँ नहीं सम्भल पाई, रो ही पड़ी,"इनकी हालत देख रही है...? ऐसे कैसे जी पाएँगे...?"
     "कुछ नहीं होगा अम्मा...। डॉक्टर को दिखा कर मैं आज ही इनका कुछ इन्तज़ाम करती हूँ...। तुम परेशान न हो...।"
     अम्मा को समझा कर मैं बाबूजी की ओर मुड़ी। वे मसूम बच्चे की तरह अब भी रो रहे थे। सहसा मुझे नीता की बात याद आई,"बुढ़ापे में आदमी एकदम बच्चा बन जाता है और अगर बीमार होकर असहाय हो जाए तो...। उफ़! एक बच्चे की तरह उनकी देखभाल करनी पड़ती है।" पर यहाँ...?
      बाबूजी शुरू से ही भारी बदन के रहे हैं। आज भी बीमारी के बावजूद वो भारीपन बरकरार है। मुझसे अकेले नहीं उठाए गए तो छोटी को बुलाया। उन्हें किसी तरह बहला कर गुसलखाने तक ले गई। उन्हें नहला-धुला कर कपड़ा पहनाने के लिए रोज़ की तरह अम्मा पहले से ही मौजूद थी, सो हम दोनो बाहर निकल आए...।
      "दीऽऽऽदी...बिना चश्मे के बाबूजी को ठीक से दिखाई नहीं देगा न...। वो तो बाथरूम में भी चश्मा पहन कर जाते हैं...।"
     "अरे, मैं तो भूल ही गई...कहाँ है उनका चश्मा...?"
     प्रत्युत्तर में छोटी ने टूटा हुआ फ़्रेम मेरे आगे कर दिया,"गुस्से में बाबूजी ने इसे तोड़ दिया...।"
     अभी मैने टूटे फ़्रेम को हाथ में लिया ही था कि तभी धम्म की तेज़ आवाज़ हुई। अम्मा के कमज़ोर हाथ आज बाबूजी के भारी बदन को सम्भाल नहीं पाए या कुछ और हुआ...ये देखने हम दोनो भीतर दौड़े और फिर एकदम जड़ हो गए।
     बाथरूम के फ़र्श पर बाबूजी औंधे पड़े थे। उनका सिर नल से टकरा कर फट गया था और उनको सम्भालने की कोशिश में अम्मा खुद फिसल गई थी...। दोनो की ऐसी हालत देख कर घर मे कोहराम मच गया था। मैने किसी तरह अम्मा को उठाने के बाद दोनो बहनों की मदद से बाबूजी को बिस्तर तक पहुँचाया। छोटी ने तुरन्त भाइयों को फोन किया और मैं चौराहे के डॉक्टर विनीत को बुलाने दौड़ पड़ी...।
     डॉक्टर के पास जाने और आने में लगा समय मानो एक युग की तरह लगा। भीतर कमरे में डॉक्टर बाबूजी का मुआयना कर रहा था और अम्मा उनके माथे को कपड़े से दबाए तेज़ी से बहते खून को रोकने का असफ़ल प्रयास कर रही थी...और मैं...?
     मैं उस पल खुद पत्थर की बुत बन गई थी...। पूरा तन बेजान-सा था पर आँखें अम्मा पर टिकी थी...। गुलाबी रंग की सिल्क की साड़ी...कलाई भर लाल-हरी काँच की ढेर सारी चूड़ियाँ...माथे पर अठन्नी भर टीका और माँग में ढेर सारा सिन्दूर...। अम्मा उम्र के साथ बहुत कुछ भूलने लगी थी पर इस साजो-श्रंगार को एक पल के लिए भी नहीं भूलती थी...। यह उनके सुहागन होने का प्रतीक-चिह्न जो था...पर इस पल...?
     सहसा अम्मा दहाड़ मार कर रोने लगी तो मुझे जैसे होश आया। डॉक्टर विनीत ‘न’ में सिर हिला कर चले गए थे,"सीवीयर हॉर्ट अटैक...सब कुछ ख़त्म हो गया...।"
     बाबूजी नहीं रहे। कानो को सहसा विश्वास नहीं हो रहा था...यह कैसे हो सकता है...? अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैं उन्हें समझा रही थी। पल जैसे थम गया था...। बाबूजी बिन कुछ खाए चले गए थे। साथ ही अपने भीतर दुःख लिए हुए भी...। बाबूजी का दुःख मैं दूर नहीं कर पाई। वह दुःख अब मेरे भीतर भर गया था, पर ज़्यादा देर रुका नहीं...बाँध तोड़ कर बाहर आ ही गया...। मैं बाबूजी से लिपट कर बिलख उठी। मुझे अम्मा को सम्हालना था, पर अम्मा मुझे सम्हाल रही थी।
     पूरा घर एक अजीब तरह के शोर से भर गया था। छोटी ने सबको फोन कर दिया था। भाई-भाभी...नाते-रिश्तेदार...अड़ोसी-पड़ोसी सभी तो आ गए थे और अपने-अपने तरीके से अम्मा को धीरज बँधा रहे थे, पर अम्मा...?
     छोटी ने बताया था, कल अम्मा पूरी रात रोती रही थी और अब उनकी आँखें एकदम सूखी थी। ख़बर पाकर तुरन्त आ गए आलोक और आशू की ओर अम्मा ने तटस्थ भाव से देखा, कुछ इस तरह जैसे कुछ हुआ ही न हो...। आँखों के भीतर पानी का स्टॉक कुछ इस तरह सूख गया था जैसे कोई नदी अपनी छाती पर ढेर सारी भुरभुरी मिट्टी व रेत के आ जाने पर सूख जाती है...।
     मुझे अन्दाज़ा भी नहीं था कि एक बाबूजी के चले जाने से घर का वातावरण इस कदर असामान्य हो जाएगा...। भीतर दालान में कुण्डे से लटके पिंजरे में तोता ज़ोर-ज़ोर से चीख रहा था...। काफ़ी देर से चुप बैठी अम्मा सहसा ही रमन की ओर घूमी,"इतनी देर से मिठ्ठू चिल्ला रहा, उसे कुछ खाने को दे दो...भूखा है...। रात से उसने कुछ नहीं खाया है...।"
      सहसा कइयों की निगाह अम्मा की ओर घूम गई पर अम्मा ने किसी की ओर नहीं देखा। ऐसा लगा जैसे वे नींद में हों...। मैं अम्मा की हालत को समझ रही थी। ऊपर से शान्त दिख रही अम्मा के भीतर कितनी उथल-पुथल थी, यह कोई भी नहीं जान पाया। भीतर के उस भयानक तूफ़ान ने उनका सब कुछ तहस-नहस कर दिया था, पर फिर भी वे अपनी गृहस्थी को बिखरने नहीं देना चाहती थी...।
     बाहर बाबूजी को घाट पर ले जाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी...। बाबूजी के निर्जीव शरीर के पास बैठी मैं उन्हें एकटक देख रही थी, पर बाहर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। उस समय तो मेरी हिम्मत बिल्कुल टूट गई जब बाबूजी को नहलाने-धुलाने के समय बाकी औरतों के साथ मुझे भी बाहर जाने को कहा गया...। मेरे भीतर एक गहरा अपराधबोध भर गया। न मैं बाबूजी को नहाने भेजती, और न शायद वे इस तरह जाते...। इस बात को याद कर-कर के मेरा कलेजा फटा जा रहा था...।
      आलोक मुझे धीरज बँधा रहे थे और मैं बच्चों की तरह बिलख रही थी...। छोटी, याशी और सीमा का भी बुरा हाल था। वे सब बारी-बारी से अम्मा को भी सम्हाले हुए थी। सहसा भाइयों ने बाबूजी की अर्थी को कन्धा दिया तो एक हाहाकार-सा मच गया...। उस क्षण मैं एकदम असहाय सी हो गई थी। सफ़ेद चादर और फूलों से ढँके बाबूजी हमेशा के लिए जा रहे थे और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी...। अम्मा भी गिरती-पड़ती बाबूजी के पीछे भागी पर थोड़ी दूर पर ही गिर पड़ी। अपना दुःख भूल कर मैं अम्मा को संभालने लगी। उन्हें धीरज बँधाते हुए मैं किसी तरह घर लाई, पर घर कहाँ था...? वो तो जैसे श्मशान-सा बन गया था...।
     पल भर में घर एकदम शान्त हो गया था।
     "बाबूजी को कुछ समय के लिए अस्पताल में भर्ती कर दो तो घर में थोड़ी शान्ति हो जाए...। जब देखो तब घर में शोर मचाए रहते हैं...।"
     आशीष की यह बदतमीज़ी भरी बात याद करके मुझे रुलाई के साथ गुस्सा भी आ रहा था। लो, आशीष की इच्छा पूरी हो गई न...। अब बाबूजी कभी शोर नहीं मचाएँगे...। उनकी आवाज़ सुनने को हम सब तरस जाएँगे...।
     मातमपुर्सी में आए लगभग सारे लोग जा चुके थे। घाट से लौटने में भाइयों को अभी देर थी। भाभियाँ घर की धुलाई करने में जुटी थी। मैने घर के हर हिस्से पर नज़र घुमाई, पर अम्मा कहीं नहीं दिखी...। छॊटी से पूछने ज ही रही थी कि तभी गुसलखाने से अम्मा की तेज़ रुलाई मेरा कलेजा चाक कर गई। छोटी उस ओर दौड़ी पर मैने रोक दिया,"आज अम्मा का दुःख पूरी तरह से बह जाने दो...।"
     भीतर गुसलखाने में अम्मा और बाहर हम सब फूट-फूट कर रो रहे थे...। सबका दुःख अपने तरीके से बाँध तोड़ कर बह रहा था...। सब कुछ जैसे ख़त्म हो गया था।
     आज तेरह दिन बीत गया है, पर इन तेरह दिनों में भी बाबूजी ने मेरे इर्द-गिर्द अपनी उपस्थिति दर्ज़ रखी...। अक्सर लगता जैसे बाबूजी कभी इस घर से गए ही नहीं और जाने क्यों लगता कि अगर वे गए नहीं तो भला बिना चश्मे के उनका काम कैसे चलेगा...? सो अपने घर लौटने से पहले मैने दो काम किए...एक तो जैसा चश्मा मैने बाबूजी को पहले बनवा कर दिया था, ठीक वैसा ही दूसरा भी बनवा कर ले आई...और दूसरा, उनकी वह मोटी-सी लॉ की किताब ढूँढ कर निकाली, जो वो अक्सर पढ़ते रहते थे। अपनी प्रक्टिस के दौरान तो रात-रात भर जाग कर भी उसको पढ़ते देखा था मैने...। ये दोनो चीज़ें मैने मेज़ पर रखी उनकी तस्वीर के आगे रख दी और फिर अम्मा को बहुत सारी हिदायतें दे कर वापस अपने घर आ गई...।
     घर में इतने सारे काम हो गए थे कि एक हफ़्ता कैसे निकल गया, पता ही नहीं चला। अब मेरे भीतर एक हूक-सी उठने लगी, जाकर अम्मा को देखूँ तो सही...अब कैसी हैं...? सिर्फ़ फोन करते रहने से क्या होता है...।
     गेट खोल कर अन्दर घुसी तो एक अजीब-से मातमी सन्नाटे ने मुझे चारो ओर से घेर लिया। सब कॉलेज, ऑफ़िस वगैरह गए होंगे, पर बाबूजी के कमरे से भुन-भुन की आवाज़ आ रही थी। सबसे पहले मैं उसी ओर गई।
     कमरे की चौखट पर पाँव धरा ही था कि चार सौ चालीस वोल्ट का झटका सा लगा...। सामने बाबूजी की तस्वीर के आगे पालथी मार के बैठी अम्मा आँखों पर बाबूजी का नया चश्मा लगाए पूरी तल्लीनता से उनकी वो मोटी-सी लॉ की किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी...।

           
(चित्र गूगल से साभार)                          

     

Friday, August 8, 2014

जंगल

`कथाक्रम' के जुलाई-सितम्बर २०१४ के अंक में प्रकाशित मेरी कहानी...

                           

          उस भयानक सपने के कारण सहसा उसकी नींद फिर टूट गई थी...। चारो तरफ़ अन्धेरा ही अन्धेरा था और वह पूरी तरह अन्धेरे में डूबी हुई थी...। कुछ इस तरह जैसे किसी ने उसे उठा कर नमकीन पानी से भरे ड्रम में फेंक दिया हो। ड्रम में उसका दम घुटने लगा था। दिल की धड़कन बेकाबू हो गई थी। उसने अनायास ही सीने पर हाथ का दबाव दिया और घबरा कर उठ बैठी, पर दूसरे ही क्षण चौंक गई।
            यह क्या...? उसका तो पूरा बदन ही पसीने से इस कदर सराबोर था, जैसे अभी-अभी किसी चिपचिपे झरने के नीचे से निकल कर आइ हो। आखिर उसे हो क्या जाता है? अच्छी-खासी तो सोती है पर रात बीतते न बीतते नींद में ही बेचैन होने लगती है...। यह कैसा सपना है जो आधी रात के बाद उसका पीछा करता है और फिर ऐसी जगह लाकर छोड़ देता है, जहाँ सिर्फ़ अन्धेरा है। एक अजीब सा अन्धेरा...हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता। मदद के लिए चीखना चाहती है तो आवाज़ नहीं निकलती...भागना चाहती है तो पैर जवाब दे जाते हैं...। ऐसे में वह अवश-असहाय सी रह जाती है...।
             उसने आँखें फाड़ कर चारो ओर देखा। सामने की प्लास्टर उखड़ी...सफ़ेद...बदरंग दीवार पर दादी की बड़ी सी तस्वीर टँगी थी और उस तस्वीर पर जाने कब की मुर्झाई माला झूल रही थी। न तो माँ ने और न ही किसी और ने उस ओर ध्यान दिया...। जीते-जी भी दादी का जीवन कोई बहुत अच्छा नहीं बीता था...। शायद इसी वजह से तस्वीर में भी दादी बहुत उदास दिख रही थी। उस निपट अन्धेरे में भी उसने उनके अशक्त होंठो के कम्पन को महसूस किया,"लाडोऽऽऽ, एक बात जानती है...दूसरे का दिया अन्धेरा तो डराता ही है, पर अपने मन का अन्धेरा...? ये डराता ही नहीं, बल्कि खा जाता है और तुझे इस अन्धेरे से बचना ही नहीं, जीतना भी है...।"
             उसकी आँखों में आँसू आ गए। दादी जब तक ज़िन्दा रही, उसे उस अन्धेरे से बचाने की भरसक कोशिश करती रही। उनकी इस कोशिश में उनकी वह जंग लगी...सड़ी-सी सन्दूकची भी शामिल थी, जिसमें न जाने कब का टूटा-फूटा...बदरंग और बेकार का सामान ही नहीं रखा था, बल्कि टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखी कुछ पोथियाँ भी थी। इन पोथियों में दादी ने अपने मन की उन ढेर सारी बातों को दर्ज़ किया हुआ था, जिन्हें कोई कभी सुनता नहीं था। उन सबके लिए वो कोरी बकवास थी, पर न जाने क्यों ये पोथियाँ या इनमें लिखी बातें उसके लिए किसी जिन्न से कम नहीं थी...। ये जिन्न मुसीबत के समय उसके लिए एक सुरक्षा घेरा बना देते थे, पर अब...? दादी क्या गई, सारे जिन्न अपने साथ ले गई, पर अपनी यादें...? उन्हें एक धरोहर की तरह सहेज कर उसके पास छोड़ गई।
            बचपन से लेकर अब तक उसे दादी की एक-एक बात याद है जैसे...खास तौर से वह कि अन्धेरे से कभी हारना नहीं है...पर वह क्या करे...? यह जंगली अन्धेरा एक काली बिल्ली की तरह उसके भीतर अपने पैने पंजों को गड़ा कर जो बैठ गया है...इसे वह अपने वजूद से कैसे अलग करे...?
            एक भरे-पूरे परिवार में रहने के बावजूद उसे जो कैक्टसी अकेलापन घेरता है, उसके लिए वह माँ को पूरी तरह से दोषी नहीं मान सकती। यद्यपि इस कैक्टसी पौधे को उसके बचपन में माँ अनजाने ही रोप बैठी। ढेर सारे पसीने से गन्धाते बदन को धक्का मारती माँ की उँगली पकड़े छुक-छुक करती ट्रेन के गन्दे से डिब्बे की नंगी सीट पर छोटी सी पालथी मार कर वह माँ के लिए जगह बना ही लेती...। माँ भीड़ से परेशान रहती, पर उसे उस गन्धाती...थप्पड़ मारती हवा के बीच भी इतना मज़ा आता कि वह उठ कर खिड़की के बाहर झाँकने का प्रयास करती और इस दौरान ढेरों बेतुके प्रश्न...ये लाइन से इतने सारे पेड़ क्यों खड़े हैं...? माँऽऽऽ, ये ट्रेन भाग रही है या पेड़...? माँऽऽऽ, इत्ते सारे लोग गाड़ी में कहाँ से आए...? गाड़ी कौन चला रहा है...?
             माँ उसके सवालों का जवाब देते-देते पस्त हो जाती। अगर मायके जाने का मोह न होता तो कभी इतनी दूर भीषण गर्मी में सफ़र न करती, पर क्या करे...? इसी समय हर जगह स्कूलों की छुट्टी होती और उसके भाई-बहन भी अपने बच्चों समेत तभी इकठ्ठा होते...।
            माँ के चेहरे के चढ़ते-उतरते भावों की महीन ऊब भरी रेखाओं से वह अनजान नहीं थी। उस नन्हीं सी उम्र में इतनी समझ तो आ ही गई थी, पर उन प्रश्नों का क्या करती जो हर गर्मी की छुट्टी में नानी के घर जाते वक़्त उसे परेशान करते थे।
            ट्रेन और शोर अपनी गति से थे और वह अपनी बाल-गति से...। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने मुँह खोला ही था कि तभी माँ झल्ला उठी थी,"बकबक करना बन्द करो...नहीं तो यहीं इस जंगल में उतार दूँगी...समझीऽऽऽ...। फिर तुम भी इन पेड़ों के साथ भागती फिरना...।"
            वह एकदम सहम गई थी, पर उस सहमन के बीच भी एक प्रश्न करना नहीं भूली थी,"माँऽऽऽ, जंगल में तो ढेर सारे जानवर होते हैं न...? शेर, भालू...चीता और भूत भी...और माँ...फिर तो हम मर जाएँगे न...?"
            "हाँ...इसीलिए तो कह रही हूँ कि चुपचाप बैठो और बाहर भागते हुए जंगल को देखो...।" वह माँ के जवाब से बेहद डर गई थी। उसके चेहरे पर एक ख़ौफ़ सा उभर आया था...। नानी के घर पहुँच कर भी ख़ौफ़ के साए में बंधी उसकी वह खामोशी नहीं टूटी थी। माँ क्या, कोई भी नहीं समझ पाया था कि उसकी छोटी-सी दुनिया में जंगल अपने पूरे अन्धेरे के साथ उतर गया था।
            सहसा वह चिहुंक पड़ी...। आसपास अब भी हल्का-सा अन्धेरा पसरा था और वह नींद में ही उस सपने से डर गई थी। यद्यपि माँ अब भी उसके डर की वजह नहीं जान पाई थी, फिर भी उसके कहने पर उन्होंने उसके कमरे में ज़ीरो वॉट का बल्ब लगवा दिया था...। ज़ीरो वॉट का वह बल्ब रोशनी कम, भयावहता ज्यादा फैलाता था, पर माँ से इस अहसास को कैसे बाँटती? माँ इस बात को कैसे समझ पाती कि चुप कराने के लिए  नन्हीं बच्ची को जिस जंगल से उन्होंने डराया था, वह तो अब उसके भीतर एक विशाल, घने जंअगल का रूप ले चुका है...। दिन के उजाले में सारे जीव भीतर दुबके रहते हैं, पर शाम घिरते ही धीरे-धीरे अंगड़ाई लेना शुरू कर देते हैं...और फिर जब सारा घर सो रहा होता है, तो वह जागते हुए उन खतरनाक जीवों से लड़ रही होती है...और जब थक कर आँखें बन्द करती है तो सपने का आकार लेकर वे फिर उसे डरा देते हैं...।
            आज भी उस कटखने सपने ने उसे इस कदर डरा दिया था कि लगा कि दिल पूरी रफ़्तार से दौड़ लगाता अपनी परिधि से बाहर आ जाएगा...और वह...? उसकी आँखों में पूरा समुद्र भरा हुआ था पर गला था कि इस कदर चटख रहा था, जैसे जलते हुए रेगिस्तान की बलूई ज़मीन पर चलते हुए उसने मीलों का रास्ता पार किया हो।
            वह उठ कर बैठ गई। गीली आँखों से दीवार घड़ी की ओर देखा , उसकी सुई पाँच पर चहलकदमी कर रही थी। उफ़ऽऽऽ, जाग तो गई थी फिर उठने में देर कैसे हो गई...। अभी थोड़ी देर और होती तो चीख-चिल्लाहट से मन खीज जाता,"दीदीऽऽऽ...ज़रा जल्दी बाथरूम खाली कीजिए न...आज मेरा टेस्ट है साइंस का...जल्दी कॉलेज पहुँचना है...।"
            "लाडोऽऽऽ, थोड़ा और जल्दी उठा कर बेटा...जानती तो है कि पिताजी को एनीमा लेने की आदत है...। क्या करूँ बेटा, मेरे इस गठिया के दर्द ने तो मुझे मार ही डाला है...वरना क्या तुझे परेशान करती...?"
            उसने माँ की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। माँ ही अगर समझती तो यह दिन क्यों आता? क्या बड़ी बेटी होना अपराध है जो पूरे घर की जिम्मेदारी सम्भालते हुए अपनी ज़िन्दगी को एक अभिशाप की तरह ढोए? अब रोज़ इससे जल्दी क्या करे? सारी रात तो जागती है, एक तो देर होने के भय से...और दूसरा वह सपना...।
            रोज की तरह गुसलखाने के बाहर एक लम्बी कतार थी। उसका दरवाज़ा आधा सड़ कर टूट गया था। उसमें नहाने वाले की आधी नंगी टाँग साफ़ दिखाई पड़ती थी...। पैरों में साबुन लगाने की जहमत भाई तो उठा लेते थे, पर बहनें डरती थी...। सामने पिताजी के कमरे का दरवाज़ा जो पड़ता था और पिताजी ठीक दरवाज़े के सामने बिछे तख्त पर लेटे बाहर का सारा नज़ारा देखते रहते थे। पिताजी के कमरे और आँगन में बने गुसलखाने के बीच जो छोटा-सा दालान था, माँ ने उसके एक कोने में ही रसोई बना रखी थी। रसोई क्या थी...पूरा कबाड़खाना...। एक कोने में पता नहीं कितनी पुरानी लकड़ी की अलमारी टँगी थी, जिस पर बेतरतीब बर्तन रख दिए गए थे। जगह की कमी के चलते फ़्रिज भी वहीं एक कोने में रखा था। सामने छोटे से पत्थर पर गैस-चूल्हा...कुल मिला कर ठीक-ठाक सी रसोई थी। कोई बाहरी आता नहीं था और परिवार के लोगों का खाना आराम से तैयार हो जाता था। माँ हमेशा पूजा-पाठ या पिताजी की सेवा में जुटी रहती...भाई-बहन अपनी पढ़ाई में और वह पूरे घर के खर्चे का भार अपने कन्धे पर उठाए फिरती...। पिताजी जब लेबर-ऑफ़िस में इंस्पेक्टर थे, तब तन्क़्वाह भले ही अधिक न रही हो, पर फिर भी घर ठीक-ठाक चल रहा था। पर उनके बीमार पड़ने, समय से पहले रिटायर हो जाने के कारण सब कुछ ऐसा तहस-नहस हुआ कि अगर वह बीच में पढाई छोड़ कर नौकरी न करती तो...?
           "लो...फिर से वही...। फ़्रिज कित्ता तो खराब हो गया है...देख...। पानी की नली जाम होने से सारा पानी फिर भीतर ही गिर गया और ये सब्जियाँ फिर खराब हो गई...। बाकी सामान तो ढँक-ढूँक कर रख देती हूँ, पर इन सब्जियों का क्या करूँ...? बाकी को तो बना कर खिला दूँगी, पर पिताजी को यह गीला-सड़ा पालक नुकसान करेगा न...।"
           माँ रुआँसी होकर कुछ और रोना रोती कि तभी उसने सौ का नोट लाकर माँ के हाथों में थमा दिया,"माँऽऽऽ, डॉक्टर ने पिताजी को ताज़ी हरी सब्जी और सेब खाने को कहा है न...ऐसा करो, तुम उनके लिए ताज़ी सब्ज़ी मँगा लो...बाकी हम लोग खा लेंगे...।"
           सहसा माँ रोने लगी,"बेटा, मैं तुझे परेशान नहीं करना चाहती...पर क्या करूँ...? तेरे पिताजी की बीमारी ने घर के खर्चे बढ़ा दिए हैं...फिर निशा, ऊषा, राजू और बबलू की पढ़ाई...कुछ सूझता नहीं है...। पेन्शन भी इतनी कम है कि उससे तो सिर्फ़ तेरे पिताजी का इलाज ही हो पाता है...। अगर तू न संभाले तोऽऽऽ...।"
            एक अजीब सी खीझभरी सिहरन उसके भीतर तक उतर गई...। यह रोज सुबह-सुबह सारी सच्चाई जानने के बावजूद माँ क्यों सारी परेशानियों का रोना रोती रहती है...? वह भी तो सब कुछ जानती है , फिर क्यों याद दिला कर उसके दिन के चन्द उजाले को अन्धेरे में तब्दील कर दिया जाता है। जिस डर से बचना चाहती है, माँ अनजाने ही उसे उस डर के सामने ला खड़ा कर देती हैं...।
            माँ रसोई में नाश्ता बनाते-बनाते बड़बड़ा रही थी, पर उसने जबरिया अपने को इन बातों से अलग किया और पूरी तौर से तैयार होकर बाहर आ गई। घड़ी की सुई नौ बजा रही थी और उसे समय से ऑफ़िस भी पहुँचना था...।
            माँ ने उसे टिफ़िन पकड़ाया तो सहसा ही वह ठिठक गई। माँ ने पिताजी के लिए सूजी का हलवा बनाया था। सुबह-सुबह इतना भारी नाश्ता...और वह भी पिताजी को...। डॉक्टर ने कितना समझाया है कि उन्हें जिस तरह दिल की बीमारी है, उसमें ऐसा घी वाला भारी नाश्ता कितना नुकसान पहुँचा सकता है...। ये घी, मलाई...सब ज़हर है उनके लिए...पर माँ को कौन समझाए...? उनके तर्क और पिताजी के चटोरेपन से वो हारी है...। सादा खाना खाने को पिताजी तैयार नहीं और लजीज़ पकवान खिलाने को माँ हर वक़्त आतुर,"यह डॉक्टर तो बस बकवास करते हैं...। अरे, अच्छा खाना खाने से कोई बीमार पड़ता है भला...? घी-दूध से तन्दरुस्ती बनती है न कि बिगड़ती है...।"
            एक बार घर की हवा बिगड़ती है तो बस सब कुछ गड़बड़ा ही जाता है...। वह न माँ को सँभाल सकती है और न खुद को...यह किचकिच रोज़ की बात है, क्या करे? घर से बाहर जाती है तो भयानक शोर उसका पीछा करता है...। ऑफ़िस पहुँचती है तो वहाँ भी शोर उसके इंतज़ार में ही होता है,"आपको पता है कि क्या समय हो गया है? वह मिस्टर जोशी आपका इंतज़ार करके चले गए...। उनके काम का क्या हुआ...?"
            बॉस गुस्से में बकते रहते और उन क्षणों में उसकी ज़ुबान पर ताला लगा होता या यूँ कहें कि वह जानबूझ कर लगा लेती...। बस, उस समय बातों के वाद्य-यन्त्र पर उसकी गर्दन थिरकती रहती...। अब तो इस थिरकन की वह इतनी आदी हो चुकी है कि घर में भी यह थिरकती रहती है...। इस पर ब्रेक भी तभी लगता है जब कोई उसे झिंझोड़ कर जगाता है...।
            "ऑफ़िस जा रही है क्या बेटाऽऽऽ? मेरी दवा खत्म हो गई है...। यह पर्ची ले ले...और हाँ, दवा के साथ ईनो की एक बड़ी शीशी ज़रूर ले लेना, कल से खट्टी डकारें आ रही हैं। पखाना भी साफ़ नहीं हो रहा है...। फोन पर ज़रा डॉक्टर से भी बात कर लेना...।"
             गर्दन की थिरकन पर सहसा ब्रेक लगा था। नहीं सम्हालती तो एक्सीडेण्ट हो जाता। वह नहीं पर पिता तो ज़रूर घायल हो जाते,"जब हज़म नहीं होता तो इतना खाते क्यों हैं?" डॉक्टर ने कितना समझाया है कि जितना कम और हल्का खाएँगे, उतनी जल्दी ठीक होंगे, पर नहीं...राजा हैं न पूरे घर के...। पड़े-पड़े हलवा-पूरी चाहिए और वह भी शुद्ध देशी घी में...और यह माँ...माँ को क्या कहें...। कहने को तो पिता की बड़ी चिन्ता रहती है उन्हें। उनकी उम्र बनी रहे इस लिए अब भी सुहागन का पूरा श्रंगार करती हैं। चौड़ी माँग में इतना ढेर सारा सिन्दूर भर लेती हैं कि पूरा माथा रंग जाता है...। पैरों की उँगलियों में सूजन बनी रहती है पर फिर भी दो-दो बिछुए...पायल...चूड़ी की खनक से भरी कलाई...। उन्हें समझ में क्यों नहीं आता कि अगर उन्होंने अपना रवैया नहीं बदला तो जल्दी ही किसी दिन यमराज पिताजी को इनसे छीन ले जाएंगे, पर ये तो अपने को सावित्री से कम नहीं समझती...। गरदन की थिरकन लगभग ठहरने को थी और भीतर जंगल में तूफ़ान आने का आसार भी था कि तभी सभी कुछ गीला-गीला सा हो गया, पता नहीं कैसे माँ उसके भीतर के तूफ़ान को भाँप लेती थी,"गुस्सा मत कर बेटा...सारी ज़िन्दगी बढ़िया खा आए हैं...अब इस उमर में रूखा-सूखा गले से उतरता भी तो नहीं है...। वो बेचारे तो खा भी लें, पर मेरे हाथ से ही नहीं निकलता...। उनकी बीमारी ने तो उन्हें नरक में धकेल ही दिया है, जीते-जी हम सब भी नरक भोग ही रहे हैं...।"
             भीगी ज़मीन चटकती नहीं, पर फिर भी उस बरसात से चटक गई थी,"ऐसा क्यों कहती हो माँ...। मैं सम्हाल रही हूँ न...। मैं बेटी नहीं, इस घर का बेटा हूँ...समझीऽऽऽ...।"
             माँ को सम्भालते-सम्भालते वह खुद लड़खड़ा गई थी...। घड़ी पर नज़र गई तो चिहुंक पड़ी,"अरे बाप रे...नौ तो यहीं बज गए...। दस तक ऑफ़िस नहीं पहुँची तो खैर नहीं...। बॉस की दहाड़ किसी चीते की दहाड़ से कम नहीं थी और वह उसी से डरती थी...। चेहरे की घबराहट को काबू में करते वह सन्नाटे से भरी गली में आ गई,"माँऽऽऽ, मैं जा रही हूँ...। दरवाज़ा बन्द कर लो...।"
              माँ ने उत्तर नहीं दिया पर छोटी बहन की चीख ने गली के अन्तिम छोर तक उसका पीछा किया,"दीदीऽऽऽ, टेलर के यहाँ से मेरा सूट लेती आना...ज़रुर से...भूलना नहीं, कल कॉलेज़ के फ़ँक्शन में पहनना है...।"
             उसने सिर हिला कर हामी भरी और फिर तेज़ कदमों से आगे निकल गई। अभी पल भर भी रुकी तो फ़रमाइशों की बारिश हो जाएगी। इस बारिश में भीगने की अब हिम्मत नहीं थी। घर से बाहर निकल कर उसने राहत की साँस लेने की कोशिश की, पर ले नहीं पाई। आकाश के पूरी तरह से खुले होने के बावजूद एक अजीब सी तपिश थी जो भीतर और बाहर से उसे झुलसा रही थी...। चुँधियाती आँखों से उसने ऊपर की ओर देखा। आसमानी समन्दर में सफ़ेद बगुले पूरी निडरता से तैर रहे थे।
             विचारों में खोई पैदल चलते-चलते वह कब बस-स्टॉप तक पहुँच गई, उसे पता भी नहीं चला। बस अभी आई नहीं थी। उसने राहत की साँस ली पर सिर्फ़ चन्द मिनटों के लिए ही...। दूर से नौ नम्बर की बस आते दिखी। बस में लोग बाहर पायदान तक लटके हुए थे। ऐसा रोज़ ही होता है...यह बस कभी खाली नहीं मिलती। इसमें वैसे तो ज्यादातर ऑफ़िस जाने वाले लोग होते हैं, पर मौका पाकर कुछ शोहदे भी घुस जाते हैं।
              बस के रुकते ही भीड़ तेज़ी से लपकी। वह भी बचते-बचाते पहुँची और रॉड पकड़ कर तेज़ी से अन्दर घुस गई। अन्दर जैसे तिल तक धरने की जगह भी नहीं बची थी । दो जन की सीट पर चार-चार लोग ठुँसे हुए थे और जिन्हें सीट नहीं मिल पाई थी, वे उपर की रॉड पकड़े हिचकोले खा रहे थे...।
              जब कोई जगह खाली नहीं दिखी तो मजबूरी में वह भी रॉड पकड़ कर खड़ी हो गई, पर खड़ी होते ही ऊपर हाथ उठाए बगल में खड़े शख़्स के पसीने का ऐसा बदबूदार झोंका आया कि उसका जी मिचला गया। घबरा कर उसने रुमाल से मुँह ढाँका तो गिरते-गिरते बची। तुरन्त अपने को सम्भाल कर उसने दोबारा रॉड की ओर हाथ बढ़ाया कि तभी एक शोहदे ने खुद गिरने की एक्टिंग करते हुए उसके बदन को छू दिया। उसे ऐसा करते देख कर सामने की सीट पर बैठा एक अधेड़ गुर्राया,"क्यों बेऽऽऽ, हरामी के जने...तेरे घर में माँ-बहनें नहीं है क्या...? सालों को जब भी मौका मिला नहीं कि औरत का बदन छूने को लपक पड़े...सालाऽऽऽ...।"
               "ऐ दद्दू...जरा ज़बान को लगाम दो...। साले, मैने क्या जानबूझ कर इन बहनजी को छुआ है...? अरे गिर रहा था सो हल्के से पकड़ लिया...कौन सा गुनाह किया...? और फिर बुढ़ऊ...तू कौन सा दूध का धुला है...?"
               पूरी बस में एक जोरदार ठहाका लगा। वह सिमट कर एक किनारे हो गई। खिसिया कर उस अधेड़ ने अपनी सीट खाली कर दी,"आप इधर बैठ जाइए...लड़कियों का बस में सफ़र करना ही मुश्किल है...।"
               "तो उनके लिए स्पेशल गाड़ी चलवा दो भैयाऽऽऽ...।"
                तू-तू, मैं-मैं बढ़ती कि तभी कंडक्टर ने बीच-बचाव कर दिया,"ठण्डे रहो भ‍इया...ठण्डे रहो...। बस में भले घर की लड़कियाँ सफ़र करती हैं...। गाली-गलौज और ओछी हरकतें करना क्या शोभा देता है...? अरे, रोज़ की बात है...आराम से रास्ता काटिए...।"
                सहसा उसका दम घुटने लगा...। ऑफ़िस टाइम था, इसी से उस बस में ही नहीं बल्कि हर जगह भीड़ थी। जहाँ तक नज़र जाती, बस लोग ही लोग...। टैम्पो के इंतज़ार में सड़क किनारे खड़े लोग...साइकिल...रिक्शा और पैदल चलने वाले...। ऐसा लगता था जैसे सारी दुनिया इसी एक शहर में सिमट गई हो...। उसके सिमटने के कारण ही हवा तक को रास्ता नहीं मिल पा रहा है...।
                उसका दम पूरी तरह से घुटता कि तभी बस एक झटके से रुक गई। यह उसका आखिरी स्टॉप था और उसका ऑफ़िस वहाँ से बस चन्द कदमों के फ़ासले पर...।
                 भीड़ का रेला एक-दूसरे को धकियाता हुआ नीचे उतरने लगा था पर वह किनारे खड़ी रास्ता खुलने का इंतज़ार कर रही थी। उठती-गिरती लहरों की तरह भागती भीड़ से उसे हमेशा डर लगता रहा है...। भीड़ छँट जाने के बाद ही वह बस से नीचे उतरती है और इस दौरान दूसरों को समझाने वाला कंडक्टर हमेशा उसके बदन को एक हल्की-सी रगड़ देना नहीं भूलता...।
                बस के पायदान से नीचे उतर कर उसने पसीने से चिपके कपड़े को हल्का-सा झटका दिया तो दुपट्टा कन्धे से सरक कर नीचे गिर गया। झुक कर उठाया तो सामने खड़े शोहदे ने फिकरा कसा,"अरे भईऽऽऽ...जब संभलता नहीं तो लोग लेते क्यों हैं...?"
                दुपट्टा संभालती वह तेज़ी से आगे बढ़ गई। उसने मुड़ कर शोहदे की ओर देखा भी नहीं। किस-किस से उलझेगी...? कल कटियार ने भी तो कहा था,"सब कुछ खुद ही संभालती रहिएगा कि कभी हमें भी मौका दीजिएगाऽऽऽ...?"
               उसने गुस्से में उसे देखा था तो कटियार ने खींसे निपोर दी,"अरे भई, मज़ाक कर रहा था। तुम तो यूँ ही छोटी-छोटी बात का बुरा मान जाती हो। अरे, जब पूरा दिन एक साथ काम करते हैं तो इतना तो बनता है न...?"
              "ठीक है...अगर बनता है तो आप अपनी पत्नी के साथ बनाया कीजिए न...उनके साथ भी तो आप रहते ही हैं न...?"
              ठहाके से पूरा कमरा भर गया तो कटियार खिसिया कर अपना काम करने लगा।
              उसने भी अपनी सीट संभाल ली। इन लोगों के चक्कर में पड़ी तो कुछ नहीं कर पाएगी। फिर यह एक दिन की बात तो थी नहीं...रोज़ ही कुछ-न-कुछ तमाशा होता रहता है...।
              उसे यह सब कभी पसन्द नहीं था, अगर मजबूरी न होती तो...। आगे सोच नहीं पाई। बगल में अपनी काली...भारी भरकम देह के साथ अम्बिका बाबू जो आ बैठे थे,"यह मिश्रा और कटियार दोनो ही बहुत हरामी हैं...। ससुरे यहाँ काम करने आते हैं या अपनी बीवी के साथ अपने सम्बन्धों का बखान करने...। अरे, रात के अन्धेरे में कौन किसके साथ मस्ती करता है, हमें क्या...? हम कोई सबके छेद में झाँकने थोड़े न जाते हैं...।"
               "और रेनू तुमऽऽऽ..." अम्बिका ने अपनी कुर्सी थोड़ा और आगे खिसका ली। उसने सवालिया निगाहों से उनकी ओर देखा, तभी अम्बिका ने उसकी हथेली अपने काले-खुरदुरे हाथों में दाब ली,"देखो रेनू...काम करने घर से बाहर निकली हो तो इतना तो तुम्हें समझना चाहिए न कि घर के भीतर और उसके बाहर बहुत कुछ अलग होता है...और हमें यह सब बर्दाश्त करना पड़ता है...।"
              "पर अम्बिका जी..."
               अम्बिका बाबू ने उसकी बात काट दी,"अरे, मैं तुम्हारी बात समझता हूँ। तुम एक संस्कारी लड़की हो, पर आज जहाँ औरत-मर्द बराबरी के हिस्से में आ गए हैं, वहाँ इतना संकोच नहीं चलता। थोड़ी-बहुत मौज-मस्ती तो चलती ही रहती है...।"
              "पर इस तरह...?"
              "अरे, छोटी-सी बात है...। कुछ बातें कह देने से तुम्हारे साथ कोई सो तो नहीं जाता न...।"
              वह हाथ छुड़ा कर सिर झुकाए चुपचाप अपने काम में जुट गई। जानती थी कि भलमानसी की आड़ में यह अम्बिका बहुत कुछ इशारा कर जाता है...। इससे भी ज्यादा बहस करना ठीक नहीं...।
               अम्बिका वहाँ डट कर बैठ गया था। अक्सर ही बैठ जाता था और समझाने के बहाने गन्दी बातों की ओर इशारा करता। आज भी वह यही कर रहा था, पर न जाने क्यों उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। वह उठी और ‘एक्स्क्यूज़ मी’ कह कर तेज़ी से बाथरूम में घुस गई। बाथरूम उस समय एकदम खाली था, उसके वजूद की तरह...। पल भर खड़ी वह कुछ सोचती रही और फिर पूरा नल खोल दिया। नल से पारदर्शी पानी की धार फूट पड़ी, साथ ही उसकी आँखों से भी...। इतना बड़ा परिवार...माँ-बाप खुदगर्ज़...या शायद उन्हें अपने बच्चों की नहीं, सिर्फ़ अपनी परवाह है...। कोई क्या कर रहा है, उन्हें मतलब नहीं...। माँ को अपना सुहाग सलामत चाहिए तो पिता को बढ़िया...मनपसन्द खाना...।
                सहसा, आँखों से बहता झरना थम गया, साथ ही भीतर कुछ कड़वा-सा घुल गया। माँ न उसकी ओर ध्यान देती है और न बाकी बेटियों की ओर...। छुटकी तो अभी काफ़ी छोटी है और भाई लोग भी अभी नासमझ ही हैं, पर यह मझली...? उससे सिर्फ़ दो साल ही तो छोटी है...। इन्टर में फ़ेल हो चुकी है, पर किसी को परवाह नहीं...। अकसर अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों को घर ले आती है और उनसे फूहड़ मज़ाक करती है। कितनी बार माँ से कहा,"माँ...बीच-बीच में तुम भी कमरे में चली जाया करो या मझली को समझा दो कि घर हो या बाहर, इस तरह का फूहड़पन अच्छा नहीं लगता...।"
                "अरे बड़कीऽऽऽ...तू तो अभी से बुढ़ियों जैसी बातें करने लगी है...। थोड़ा-बहुत हँसी-मज़ाक...मौज-मस्ती कर लेती है तो क्या हुआ...? घर में ही तो करती है और फिर शादी हो जाने पर ये सब कहाँ नसीब होगा...? अब बस, तू पुरखिन बनना बन्द कर दे...।"
               उसने माँ से तो कुछ नहीं कहा, पर आँखें पूरी तरह से भर आई थी। मझली को हर बात की छूट है, पर माँ ने उसकी मौज-मस्ती का तो कभी ख़्याल नहीं किया। इण्टर पास किया ही था कि पिताजी को सीवियर हॉर्ट-अटैक पड़ा। वे साल भर पहले ही रिटायर हुए थे। रिटायरमेण्ट पर मिला पैसा उनके इलाज की भेंट चढ़ चुका था। वह सबसे बड़ी थी, इसी से उसकी ही क़ुर्बानी दी गई।
                आसपास का वातावरण भीषण शोर-शराबे से भरा होने के बावजूद सहज था। कोई बतियाने में लगा था तो कोई सिर झुकाए फ़ाइलों में उलझा था। ऑफ़िस की भाषा में यह असहजता नहीं थी, पर पता नहीं क्यों काफ़ी अर्से से यहाँ होने के बावजूद वह कभी अपने को सहज नहीं महसूस कर पाई।
                "मैऽऽऽम...आपको सर बुला रहे हैं...।" ऑफ़िस प्यून राकेश ने आकर कहा तो सहसा वो चौंक पड़ी..."आँ..."
                "मैऽऽऽम...सर ने कहा, अर्जेण्ट है...।"
                "अच्छा...अच्छा...जा रही...पहले एक गिलास पानी पिला दो...।"
                पानी का गिलास लाने में राकेश ने ज़रा भी देरी नहीं की। उसने गिलास थामा और एक ही साँस में पी गई। भीतर कहीं कुछ अटका हुआ था, जो पानी की धार से भी नहीं सरका। उसने राकेश की ओर देखा और सकपका गई। राकेश के होंठो पर एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट थी। गिलास थमाते हुए उसने एकदम सहज दिखने की कोशिश की,"राकेश, तुम्हारी बच्ची अब कैसी है...? उसका बुखार उतरा कि नहीं...?"
                  "जी मैम...अब ठीक है...पर डॉक्टर पैसा बहुत खा गया...। और आपके बाबूजी कैसे हैं...?" हड़बड़ा कर राकेश भी सहज हो गया।
                "अभी दवा चल रही है...।"
                वह जानती थी कि राकेश न उसका मज़ाक उड़ा रहा था और न ही उसे दुःख देना चाहता था। वह अर्थपूर्ण मुस्कराहट तो अनायास ही उसके चेहरे पर उभर आती थी। वह ही नहीं बल्कि ऑफ़िस का हर शख़्स जानता था कि ढेर सारी लड़कियों की उपस्थिति के बावजूद सिंह साहब सिर्फ़ उसी पर फ़िदा थे...। उसके तीखे नैन-नक़्श, गोरा रंग और साँचे में ढला शरीर उन्हें ही नहीं बल्कि कइयों को आकर्षित करता था, पर वह क्या करे...? इन सबसे उलझन होने के बावजूद उसके वश में कुछ नहीं था।
                उसके दुःखी या गुस्सा होने पर हर कोई यही कहता था,"अरे यार...बाहर की दुनिया में तो यह सब चलता ही रहता है। इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है...?"
                "शुक्र मनाओ कि भगवान ने इतना बड़ा खज़ाना तुम्हें दिया है...। मुझे देखो...मेरी ओर तो कोई देखता भी नहीं...।" कमला कह कर जोरदार ठहाका मार कर हँसी थी। वह एकदम रुआँसी हो उठी थी।
                 "मैऽऽऽम...सिंह साहब इंतज़ार कर रहे हैं...। उन्होंने कहा है कि शैलेश के केस वाली फ़ाइल भी उन्हें चाहिए...।"
                 "अच्छा...अच्छा..." वह एकदम हड़बड़ा गई। शैलेश के केस की फ़ाइल तो वह भूल ही गई थी। उसमें से दो-तीन रिमाइन्डर भी भेजने थे, पर अब...?
                 डरते हुए उसने केबिन का दरवाज़ा नॉक किया,"मे आई कम इन सर...?"
                 "हाँ-हाँ...आओ न...। इसमें पूछने की क्या बात है...।"
                  सिंह साहब काफ़ी खुशनुमा मूड में थे। ऐसे में उसे सहज हो जाना चाहिए था, पर वो हो नहीं पाई। एक अजीब सी अनहोनी की आशंका उसे उस केबिन में घुसते वक़्त ही घेर लेती थी।
                  "अरे बैठो न...खड़ी क्यों हो...?"
                  "जी..."कुर्सी खींच कर वह उनके सामने बैठ गई,"सर, इधर तबियत ठीक नहीं थी। पापा की वजह से भी कुछ परेशान थी। इसी लिए इस केस की फ़ाइल पूरी तरह कम्प्लीट नहीं कर पाई...। प्लीज़ सर...एक दिन का टाइम और दे दीजिए...।"
                  "पगली हो...इतना डर क्यों रही हो...? मैने कुछ कहा...? परेशान थी तो मुझसे कहा होता। मैं नमन से कह देता रिमाइण्डर भेजने के लिए...।"
                  सिंह साहब की आँखों में लाल डोरे उभरने लगे थे,"एक बात कहूँ रेनू...इस लाल सूट में बहुत गज़ब लग रही हो...।"
                  "थैंक्स सर...। सर, मेरे पचास हज़ार के लोन का क्या हुआ...? एप्लाई किए हुए महीना हो रहा है...। अभी कितने टाइम की और उम्मीद करूँ...? सर प्लीज़...मेरी तनख़्वाह से काट लीजिएगा...।"
                  "अरे हाँऽऽऽ...याद आया...तुमने कहा तो था मुझसे...। मैं ही भूल गया था...। छः महीने बाद तुम्हारी बहन की शादी है न...। अरे भई, छोटी बहन की शादी है और तुम अभी तक यूँ ही बैठी हो...यह बात गले से नीचे नहीं उतर रही...। क्या तुम्हें साथी की ज़रूरत महसूस नहीं होती...?"
                 "ऐसी कोई बात नहीं है सर...बहन की शादी हो जाए तो माँ मेरे बारे में भी सोचेगी...।"
                 "और जो मैं तुम्हारे बारे में दिन रात सोचता हूँ...वो...उसका क्या...?"
                 "जीऽऽऽ...?" वह जब तक कुछ समझे-संभले...उसके पास आ चुके सिंह साहब ने उसके चारो ओर अपनी बाँहों का मजबूत घेरा कस दिया था,"तुम चीज़ ही ऐसी हो रेनू...कोई भी अपना आपा खो दे...। उफ़...कितना गुदाज़ जिस्म है तुम्हारा...। प्लीज़ रेनूऽऽऽ...एक बार मेरे साथ कहीं बाहर चलो न...उसके बाद कुछ नहीं कहूँगा...। और तुम्हें ये पचास हज़ार का लोन लेने की भी ज़रूरत नहीं...वह तुम पर यूँ ही न्यौछावर...।"
                 उसे शुरू से ही सिंह साहब की नीयत पर शक़ था, पर क्या करती...? छोटी-मोटी आश्लील बातों के सिवा अब तक उन्होंने कुछ और किया भी नहीं था। ऑफ़िस में इस तरह की बातों को बर्दाश्त करना ही पड़ता है, वरना घर बैठो...हर कोई उसे यही समझाता था। दादी ने खुद एक बार कहा था,"बेटा, एक बात कहूँ...? मैं तुम सब की तरह पढ़ी-लिखी भले न हूँ पर अनुभव में तुम सब से ज्यादा ही हूँ। तुम्हारे माँ और पिताजी तो मेरी बात पर ध्यान देते नहीं, पर मैं जानती हूँ कि तुम सब समझती हो...। बेटाऽऽऽ, किसी को डराने के लिए तो जंगल का बहाना चल जाता है, पर बेटा...किस-किस से डरोगी...? अब तो ये जंगल पूरी दुनिया में फैल गया है...अपने झाड़-झंखाड़ और काँटों के साथ...। जंगली जानवर भी यहाँ-वहाँ पसरे पड़े हैं...। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही है कि मानव-खोल में उनका असली चेहरा छिप गया है। अब ये तुम्हारे ऊपर है कि उनके बीच रह कर तुम अपने को कितना सुरक्षित कर सकती हो...।"
                  दादी की बात सुन कर वो अवाक थी। जो बात दूसरे नहीं समझ पाते थे, वो बात दादी कैसे समझ लेती थी...? पर वो दादी को कैसे समझाती कि दादी...जब जन्म देने वाले ही अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए औलाद को खुँख्वार जानवरों के आगे धकेल देते हैं तो बचने का कौन सा रास्ता रह जाता है...?
                 "रेनूऽऽऽ...तुमने जवाब नहीं दिया...।" छाती पर बाँहों का घेरा कुछ जरूरत से ज्यादा कस गया तो छटपटा कर उसने पूरी ताकत से हाथ अलग किया और छिटक कर दूर जा खड़ी हुई,"सरऽऽऽ...मैं उस तरह की लड़की नहीं हूँ...। आज मेरे पापा बीमार न होते तो मैं इस नर्क में आती ही क्यों...?"
                "यह नर्क है...? अरे, यह तो जन्नत है...जन्नत...। लड़कियाँ मेरी एक निगाह के लिए तरसती हैं, पर क्या करूँ...? तुम्हारे सिवा मुझे किसी से इश्क़ हुआ ही नहीं...।"
                सिंह साहब पूरी बेशर्मी से मुस्करा रहे थे,"इतना डर क्यों रही हो...? किसी को पता तक नहीं चलेगा...।"
                उसकी साँस इतनी तेज़ चल रही थी कि लगा जैसे दिल उछल कर बाहर आ जाएगा। सिंह की मेज़ पर पानी का भरा गिलास रखा था, उसने बिना पूछे उठाया और एक ही साँस में खाली कर दिया। पल भर बाद जब कुछ संयत हुई तो दुपट्टे से आँसू पोंछते हुए बाहर निकल गई,"सर, कुछ तो ख्याल कीजिए...। भाभी जी का...कितना विश्वास करती होंगी आप पर...और आपके बच्चे...? उन्हें पता लगेगा तो शर्म से मर ही जाएँगे...।"
                 उसने मुड़ कर भी नहीं देखा...देखना भी नहीं चाहती थी कि जंगली-बेशर्म चेहरे पर उसकी बातों की क्या प्रतिक्रिया हुई।  उसे सिर्फ़ इस बात की चिन्ता थी कि जल भुन कर सिंह कहीं उसे नौकरी से न निकाल दे। अगर निकाल दिया तो क्या होगा...? छोटी का ब्याह सिर पर है...पिताजी बीमार हैं...बाकी भाई-बहनों की पढ़ाई...घर के खर्चे...और पेन्शन इतनी कम...।
                बाहर निकलते ही इतनी ज़ोर से लड़खड़ाई कि लपक कर रीता न संभालती तो मेज का कोना पेट घायल ही कर देता,"क्या हुआ रेनूऽऽऽ...? सर ने डाँटा क्या...?"
                "ये सर भी न...। अरे, एक फ़ाइल ही तो इनकम्प्लीट है न...तू मुझे दे, मैं कर देती हूँ...। तू घर जा...तेरी तबियत ठीक नहीं लग रही...।"
                वह माथा पकड़ कर वहीं धम्म से बैठ गई। पूरा ऑफ़िस सच्चाई जानता था पर सवालों की आड़ में हर कोई अनजान बन जाता था...। वह खुद भी तो यही कर रही थी। एक झीना सा नक़ाब था जिसने उसके चेहरे को ही नहीं, बल्कि आँखों के समन्दर को भी कोहरे की तरह ढँक लिया था...।
                उसने अपनी धौंकती साँसों पर किसी तरह काबू पाया और फिर उठ खड़ी हुई,"तुम लोग परेशान न हो। मेरी तबियत सुबह से ही खराब थी, घर जाकर आराम करूँगी तो ठीक हो जाएगी...।"
                 उसने फ़ाइल रीता को दी और फिर तेज़ी से बाहर निकल गई। पल भर भी और रुकती वहाँ तो सुनामी ही आ जाती...। समन्दर की लहरों ने पूरी प्रचण्डता से उछाल मार दिया था...। लॉबी के एकान्त में वह पूरी तरह डूब गई थी...। किनारे के लिए हाथ-पाँव मारे भी, पर किनारा था कहाँ...?
                 किनारा नहीं था, पर लहरों को जाने क्या सूझा, उन्होंने उसे बाहर उछाल दिया पर बाहर तो और भी डरावना मंजर था। पूरा शहर एक भयानक जंगल में तब्दील हो चुका था और खुँख़्वार जानवरों ने नक़ाब पहन लिया।
                 होशोहवास को संभालते वह किस कदर घर पहुँची, उसे नहीं पता...। पर वहाँ घर था कहाँ...एक शमशानी सन्नाटे ने पूरे घर को घेर जो रखा था। सोचा था, अन्दर जाकर पहले शॉवर के नीचे इतना रगड़-रगड़ कर नहाएगी कि सिंह के हाथों की वह गन्दी छुअन पूरी तरह घुल जाएगी और फिर माँ के सीने से चिपट कर अपना सारा दुःख आँखों के रास्ते बहा देगी...। वो माँ हैं...उसका सारा दुःख लेकर उसे ज़रूर मुक्त कर देंगी...।
                 दहलीज़ के अन्दर पाँव रखते ही वह एक बार फिर लड़खड़ा गई। सामने मंझली और छोटी बुरी तरह रो रही थी। अपना दुःख भूल कर वह तेज़ी से उधर लपकी,"क्या हुआ...? तुम लोग रो क्यों रही हो...?"
                "दीदी, पिताजी कॉर्डियोलॉजी में हैं...। माँ बार-बार तुम्हें फोन लगा रही थी, पर फोन स्विच ऑफ़ था।"
                "क्या हुआ पिताजी को?" उसकी साँसें फिर तेज़ हो गई।
                "पिताजी को अटैक पड़ा है...डॉक्टर ने पेसमेकर लगाने को कहा है...। अगर नहीं लगा तो पिताजी...।"
                 मझली बुरी तरह सुबक पड़ी,"माँ ने कहा है कि आप अपने ऑफ़िस से तुरन्त रुपयों का इंतज़ाम कर दीजिए...।"
                पल भर वह अवाक खड़ी रही, फिर जैसे होश आया। उसने तुरन्त सिंह साहब का नम्बर मिला दिया,"सर, मुझे पचास हज़ार की सख़्त ज़रुरत है...तुरन्त...औरऽऽऽ...मुझे आपकी शर्त मंजूर है...।"
                 फोन उसके हाथ से छूट गया। वह चकरा कर ज़मीन पर बैठ गई। आँखों के आगे घना अन्धेरा छा गया...। काले अन्धेरे से घिरे भयानक जंगल ने उसे चारो ओर से घेर लिया था और वह रास्ता भटक गई थी।
                 सहसा, वह बुक्का फाड़ कर रो पड़ी। लगा जैसे खुँख़्वार जानवरों ने एक-एक करके उसके सारे कपड़े नोच लिए हैं और अब वो किसी भी क्षण उसके नग्न शरीर में अपने पैने दाँत गड़ा सकते हैं...।

                 
             
        (चित्र गूगल के सौजन्य से )