Thursday, September 30, 2010

अपनी बात

आज मैं आपके सामने अपनी उस शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक के अंश लेकर आई हूँ जो मेरे हाल ही में भोगे गए एक डरावने सच को आपके सामने लाएगा । मैं अपनी इस कोशिश में कहाँ तक सफ़ल हुई हूँ , यह तो वक़्त ही तय करेगा , और तय करेंगे आप लोग भी...।

अपनी बात

यह न कोई कथा है जिसे बाँचने बैठी हूँ...और न कोई कहानी है , जिसे रस लेकर सुनाने चली हूँ...। यह ज़िन्दगी का एक ऐसा सच है , जिससे हर किसी का कभी न कभी वास्ता पड़ा है...। यह सच जितना डरावना है, उतना ही कुछ सिखाता भी है ।
ज़िन्दगी और मौत का फलसफ़ा हर किसी की समझ में नहीं आता और जिसकी समझ में आ गया, वह इस संसार का नहीं रहता...। राग-विराग, प्यार-घृणा, दोस्ती-दुश्मनी, रिश्तेदारी...सब इस फलसफ़े में उलझ कर रह जाते हैं । यहाँ तक कि निराशा के क्षणों में ईश्वर से भी विश्वास उठ जाता है । मन की आस्था इस कदर डगमगा जाती है कि सच और झूठ में भी आदमी फ़र्क करना भूल जाता है और भूल जाता है इस सत्य को स्वीकारना कि जो इस दुनिया में आया है, वह एक न एक दिन जाएगा भी ।
जिसे आघात लगता है, वह अपनी चेतना खोकर ही जीवन के सच को अस्वीकारता है पर यह स्थिति हमेशा तो नहीं रहती । चैतन्य होने पर जब इस सच से सामना होता है तब मन में एक सवाल जरूर उठता है कि भले ही मेहमान की तरह इन्सान इस दुनिया में आए और जाए पर साथ ही एक सन्तोष भी देकर जाए कि उसने अपनी उम्र तो गुज़ार ली, अपनों या दूसरों को कुछ दिया तो...और खुद भी सुख और दुःख की लहर-भंवर से सकुशल निकला भी...। पर जब अपना कोई प्रिय दूसरों की लापरवाही के चलते अधूरी उम्र में ही सहसा बीच भँवर में फँस कर आँखों के सामने से विलीन हो जाए और हम तट पर खड़े हाथ मलते ही रह जाएँ, तब कैसा लगता है ?
माताजी-पिताजी के वक़्त आघात तो लगा था पर एक सन्तोष था मन में कि भले ही बहुत लम्बा जीवन न सही , पर इतना तो उन्होंने जिया ही , जहाँ सुख-दुःख दोनो ही नदी के दो किनारों की तरह थे और उनकी भरी-पुरी गृहस्थी में हल्की सी हलचल थी तो शान्त बहाव भी था...। उनके बाद सहसा ही छोटी बहन बहुत ही कम उम्र में गई तो दर्द से छटपटाने के बावजूद हम बेहद असहाय थे । वह ज़िन्दगी के गहरे समन्दर के उस छोर पर थी जहाँ मौत का मगरमच्छ पूरा जबड़ा खोले खड़ा था और किसी भी पल अपने अन्दर ले सकता था । हम कोशिश भी करते तो उस तक नहीं पहुँच सकते थे ।
पर अभी हाल में १० अप्रैल २०१० को दूसरी बहन स्नेह की ज़िन्दगी और मौत से जंग इतनी गहरी हो गई कि कहीं न कहीं हम सब उसमें उलझ कर रह गए । यह मौत एक गहरा आघात तो दे ही गई पर कुछ ऐसे सवाल भी छोड़ गई है जिसका उत्तर पाना मेरे परिवार के लिए ही नहीं बल्कि उन सब के लिए भी जरूरी हो गया है जिन्होंने ऐसी ही जंग में अपनी हार से अपने प्रिय को खोया है...दुश्मन को और भी मजबूत होते हुए देखा है...मुसीबत के वक़्त रिश्तों को बिखरते देखा है और समझा है कि धन , पहुँच और दबदबे का इस सदी में कितना महत्व है...।
तकनीकी तरक्की के इस युग में यह सब जिसके पास है , वह मौत की जंग में हारे या जीते, पर इतना सन्तोष उसे जरूर रहता है कि जीतने के लिए उसने अपने साधनों के बल पर कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी ।
मैं चूँकि एक लेखिका भी हूँ और अपनी बहन की मौत से जंग की ही नहीं , वरन् उन सभी लोगों की तकलीफ़ की , उस प्रवास के दौरान जीवन्त गवाह बनी जो शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकते...। रोज अख़बार के पन्नों पर इस पीड़ा को काले अक्षरों में उभरते देखती हूँ, उसे महसूस भी करती हूँ पर इससे इतर जो आँखों से देखा , उस दौरान जिस दुःख को झेला और सरकारी अस्पतालों की अन्दरूनी अव्यवस्था को देखा, उससे तो सिहर ही उठी हूँ और यह सिहरन भरा दर्द मेरे भीतर इस क़दर उतर गया है कि जब तक उसे व्यक्त नहीं कर लूँगी, तब तक मन को चैन नहीं आएगा ।
इस पुस्तक के माध्यम से न मैं अपने दर्द का बदला लेना चाहती हूँ और न ही खुन्नस निकालना चाहती हूँ...। चाहती हूँ तो बस इतना कि वे इन्सान जो जाने-अनजाने इस दर्द के जिम्मेदार बन जाते हैं वे महसूस करें और साथ ही इस सच को भी स्वीकार करें कि वे दंभ में किस कदर लापरवाही कर बैठे हैं...। अगर अपनी ज़िन्दगी अनमोल है तो दूसरों की भी तो है । उसके साथ खिलवाड़ क्यों ? मरीज और तीमारदार डाक्टर को भगवान का दर्जा देते हैं पर जब वही दगा दे जाए तो कहाँ सहारा है ? बाहर से साफ़-सुथरा , सजा-सँवरा आदमी अगर भीतर से मन का काला हो तो उसे माफ़ नहीं किया जा सकता ।
अपने देश में हजारों की संख्या में सरकारी-गैरसरकारी अस्पताल गोबरछत्ते की तरह उग आए हैं पर सरकार से सहायता मिलने के बावजूद सुविधा के नाम पर वे ज़ीरो हैं । कुछ अस्पताल अच्छी सुविधाएँ देकर जान तो बचा लेते हैं पर यह सब क्या आसान है ? अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है इसके लिए...।
विगत दिनो दैनिक अमर उजाला में ख़बर तो बड़ी अच्छी छपी कि ग़ैर संचारी रोगों- मधुमेह , कैंसर और दिल की बीमारी की रोकथाम के लिए केन्द्र सरकार राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करेगी । स्वास्थ्य मंत्रालय की इस योजना को हरी झंडी भी दे दी गई है ।
सभी जानते हैं कि हर वर्ष हज़ारों की संख्या में इन रोगों से लोगों की मौत होती है और इनकी रोकथाम के लिए योजनाएँ भी बनती हैं , पर होता क्या है ? क्या इससे मौत का आँकड़ा कम हो रहा है ? शायद नहीं...। हर कोई अपना काम करके किनारा कर लेता है । स्वास्थ्य मंत्रालय लाखों-करोड़ो रुपया सरकारी अस्पतालों को ऐसे रोगों के लिए अनुदान में देता है पर इसकी सुविधा कितनों को मिलती है ?
देश में बढ़ते भ्रष्टाचार से आज कोई भी अनजान नहीं है । रोज अख़बारों में, इलेक्ट्रानिक मीडिया में चीख़-चीख़ कर कहा जाता है," यह आम मत खाना , यह जहरीला है...इसे कैमिकल से पकाया गया है...। यह केला मत खाना, कैंसर हो जाएगा...। आटा सोच-समझ कर खरीदना...यह सड़े हुए गेहूँ का हो सकता है...।" और तो और , करेले और लौकी के जूस से लोगों की मौत की ख़बर मीडिया में कई रोज तक छाई रही । जिस मेवे को खाने पर हम गर्व करते थे, आज उसमें भी चमक के लिए गंधक का प्रयोग किया जा रहा है । इन सब के चलते बीमारियों से ग्रसित हो जब हम उस डाक्टर के पास जाते हैं जिस पर हम विश्वास करते हैं , तो अधिक से अधिक पैसा कमा लेने की ललक में वही हमसे विश्वासघात कर बैठता है ।
मिलावटी खाद्यान्नों को रोकने के लिए छापे मारे जाते हैं, सील डाली जाती है, अख़बार के कुछ पन्ने और रंग जाते हैं पर होता क्या है...? कुछ दिन बाद वही काम फिर शुरू हो जाता है । खाने के हर सामान में ज़हर है, कब नकली दवाओं से वास्ता पड़ जाए, नहीं मालूम...। ऊपर् तक् सुनवाई नहीं है, कोई जाए तो कहाँ जाए ? जिस् तरह् धरती और् हरियाली बचाने के नाम् पर् काग़ज़् पर् ही लाखों-करोड़ों पेड़् लग जाते हैं, उसी तरह ये साधन भी काग़ज़ तक् ही सिमट कर रह जाते हैं । रोगों के खिलाफ़ अभियान को हरी झंडी देने के साथ क्या यह भी महत्वपूर्ण नहीं है कि सबसे पहले शुद्ध खाद्य वस्तुएँ लोगों तक पहुँचाई जाएँ ? शुद्ध हवा, पानी, खाद्यान्न मिलेगा तो कई रोग खुद-ब-खुद थम जाएँगे । सरकारी या ग़ैर-सरकारी, यदि सभी अस्पतालों की व्यवस्था पर नज़र रखी जाए तो मौत का आँकड़ा शायद अपने आप कम हो जाएगा । पर यह सब कहने से क्या कोई फ़ायदा है ? जितनी भी आवाज़ें अन्याय के खिलाफ़ उठती हैं, वे मात्र चीख ही तो बन कर रह जाती हैं...पर किसी अन्याय् के आगे झुक जाना मेरी आदत नहीं...।
अन्य अस्पतालों की व्यवस्था-अव्यवस्था के बारे में ज्यादा चर्चा करना मैं जरूरी नहीं समझती । चूँकि मैं लखनऊ के पी.जी.आई में ही अपनी बहन के साथ रही, इसी लिए वहाँ जो कुछ भी देखा, जिसने मुझे दुःख दिया, मेरी बहन की दुर्दशा का भागीदार बना, उसी को मुख्य मुद्दा बनाया है । उस अस्पताल के लोगों से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं है । मैं इस माध्यम से उन्हें या अन्य लोगों को जताना चाहती हूँ कि कभी-कभी बड़े नाम वाले भी बहुत छोटा काम कर जाते हैं । किसी को पीड़ा देते वक़्त उन्हें अहसास भी नहीं होता कि उन्होंने क्या कर दिया है...।
मेरी यह शाब्दिक पीड़ा मात्र पीड़ा नहीं है बल्कि यह बहुत कुछ सिखा भी गई है । यह् आँखों देखा एक ऐसा सच है जो बेहद डराता तो है पर दुश्मन का सामना करने की हिम्मत भी देता है ।
मैं इस पुस्तक के माध्यम से अपनी बहन की ही नहीं बल्कि उन सभी की हिम्मत की दाद देती हूँ जिन्होंने बड़ी बहादुरी से अन्तिम साँस तक इस जंग को लड़ा । उनके तीमारदार भी कम हिम्मती नहीं जो गोण्डा, बक्सर, लखीमपुर, कानपुर, गोरखपुर, छोटे शहरों, दूर-दराज़ के देहात, आदि जगहों से आए और मौत से हार कर , लुट कर , अपने प्रिय को खोकर घर लौट गए...ज़िन्दगी को एक बार फिर ज़िन्दादिली से जीने के लिए...।


( अभी जारी रहेगा )


Sunday, September 19, 2010

भीतर की बाढ़

कविता

भीतर की बाढ़

अभी तक

किताबों में पढा था

फ़िल्मों में देख़ा था

और

ज़ुबानी सुना था

गाँव में जब बाढ़ आती है

उजड़ जाती है

ज़िन्दगी

चील-कौओं का ग्रास बनता

ठहरता आदमी

मौत के जलाशय में

हरी काई सी जमी निराशा

पर कहीं

आकाश में

दीप सा जला सूरज

और इन सबके बीच

एक मनुआ है...

दिदियाऽऽऽ ,

सुना है

इस बार सहर मा बाढ़ आई है

और

तटवा किनारे पूरा सहर जमा है

तब,

पता नहीं क्यों

मेरे अंदर की जंगली बिल्ली ने

अपने पंजों को खोल दिया

तट किनारे जाकर देख़ा तो भूल गई

किताबों में पढ़ी

बाढ़ की त्रासद-कथा

याद रहा तो सिर्फ़

सदियों पूर्व का जल-प्रलय

और उस प्रलय के बीच

जन्मित सृष्टि

पर आज,

तट के किनारे

प्रलय का मुँह चिढ़ाती

सृष्टि आह्लादित थी

दृश्य सटीक था और अधुनातन भी

मेरी काली आँखों का लेंस सक्रिय हो उठा

मन ने कहा,

कोई दृश्य छूटने न पाए

जर्जर झोपड़ियों में

मौत की काली परछाई सा

ठहरा अंधेरा

और,

उस अंधेरे के बीच

चीथड़ों में लिपटा

दूधिया बदन

गंदलाए फेनियल पानी में

गले तक डूबे घर

घर की छत से चिपकी

ज़िन्दगी की भीख माँगती

कातर आँखें,

पर,

उन आँखों से बेख़बर

नपुंसकों की भीड़

जब-तब किसी पाजी बच्चे सी

ताली बजा रही थी

और बच्चा?

पता नहीं किसका

गंदे पानी के भंवर में था

रुकी ताली के बीच

कोई चीख़ा

उफ़...

वह डूब रहा है

और तभी कैमरा क्लिक हो गया

ओह!

कितनी ख़ूबसूरत बात

ज़िन्दगी और मौत एक साथ?

Sunday, May 2, 2010

दैनिक जागरण के १५ अप्रैल २०१० के अंक में एक विज्ञापन पढा कि डा. ( श्रीमती) नज़मा हेपतुल्ला की अध्यक्षता वाली राज्यसभा की अधीनस्थ विधान सम्बन्धी समिति ने “ उपभोक्ता सरंक्षण विनियम २००५” की जाँच करने का निर्णय लिया है । इसके लिए कुछ सुझाव भी माँगे गए हैं ।
मैं जहाँ तक समझती हूँ जो भी व्यक्ति अपने हित के लिए पैसा खर्च करता है , वह उपभोक्ता कहलाने के दायरे में आता है , फिर चाहे वह खाने-पीने की चीज़ें हों , सुख-सुविधा का सामान हो या फिर अपनी या अपने परिवार के किसी सदस्य का इलाज कराके उसकी जान बचाने का सवाल हो…।
मिलावटी खाद्य वस्तुओं ने जिस तरह हमारी ज़िन्दगी में ज़हर घोल दिया है , उसी तरह भ्रष्ट समाज के चन्द लोग भी हमारी ज़िन्दगी से खिलवाड कर रहे हैं । उनके नाम-दाम के कारण आम आदमी उनका कुछ नहीं बिगाड पाता । इधर कुछ डाक्टर अपने कर्तव्य से इतना भटक चुके हैं कि वे डाक्टरी की पढाई के दौरान दिए गए वचन को भूल कर ज़िन्दगियों से खिलवाड कर रहे हैं । नाम-दाम से फलते-फूलते ऐसे डाक्टरों के कारण जिसके घर की ज़िन्दगी खत्म होती है , क्या उसकी कोई सुनवाई है ? जो लोग अस्पताल या डाक्टर की गलती से जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं , उनके लिए क्या प्रावधान हैं ? कानून सुधार प्रक्रिया में ऐसे मरीजों के लिए क्या कोई जगह है ? अगर नहीं तो मेरा सुझाव है कि उन्हें भी उपभोक्ता कानून का पूरा संरक्षण मिलना चाहिए…बस इतना सुनिश्चित रहे कि उस कानून का कोई दुरुपयोग न कर सके…।

Friday, April 30, 2010

जी के जंजाल ये पार्क…

हरे-भरे पार्क किसे नहीं भाते ? नगर निगम ने कई मोहल्लों को एक-एक पार्क तो मुहैया करा दिए हैं पर इन पार्कों के कारण मोहल्लों में जो शीत-युद्ध चलने लगा है , उससे निगम को कोई मतलब नहीं होता । पार्क को हरा-भरा बनाने के लिए कोई भी व्यक्ति आगे आता है , सबसे एक निश्चित रकम हर महीने लेता है…कोई देता है तो कोई नहीं देता । हर महीने पार्क की भलाई के लिए मीटिंग की जाती है …लोग इकट्ठे होते हैं…बात हँसी-मज़ाक और हरे-भरे पेड से शुरू होकर सिर-फुटौव्वल की नौबत तक आकर रुक जाती है । मीटिंग के बाद एक-दूसरे को दोष देते हुए अपशब्द कहना , व्यंग्य कसना , आदि आम बात सी हो जाती है…। बहरहाल पार्क तो हरा-भरा हो जाता है पर आपसी व्यवहार पर पतझड की जो गाज़ गिरती है , उसका क्या हल है ? इधर सुना है कि सिर फुटौव्वल से बचाने के लिए ही नगर निगम ने कुछ पार्कों को गोद ले लिया है । समय पर उनका माली आता है , पेड लगाता है , किसी घर से पानी लेकर सींचता है और फिर चला जाता है …पर बावजूद इसके पार्क को गोद में उठा कर कुछ लोगों ने इसे जी का जंजाल बना दिया है…।

Thursday, April 29, 2010

ये संस्कारहीन बुजुर्ग...

कहा जाता रहा है कि बडे-बुजुर्ग हमारे आदर्श हैं...पर आज के बुजुर्गों को क्या कहें ? ये अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की बजाय खुद इतने अधिक संस्कारहीन हो चुके हैं कि उन्हें बुजुर्ग कहते हुए भी शर्म आती है । आज कई गली-मोहल्लों में ऐसे रिटायर्ड बुजुर्ग मिल जाएँगे जो अपनी आवारगी से युवा पीढी को भी शर्मिन्दा करते हैं । छत के छज्जे पर खडे होकर आने-जाने वाली महिलाओं को ताकना , हर वक्त नए व्यंजन खाने के नाम पर घर की महिलाओं को तंग करना , घर की ही बहू-बेटियों की प्राइवेसी में दखल देकर उनका जीना हराम करना , बच्चों के ऊपर बिना बात चीखना-चिल्लाना आदि आम बात है । बुजुर्गियत की आड में संस्कारहीनता का यह कौन सा अपराध समाज में पनप रहा है और इससे निज़ात पाने का , इसे सुधारने का क्या उपाय है , यह सोचने की बात नहीं है क्या...?

Wednesday, April 28, 2010

ये डाक्टर हैं या...

कानपुर के सरकारी उर्सला अस्पताल के गेट पर कुछ कलाकारों ने नुक्कड नाटक " तोडफोड से क्या होगा ?" करके मरीज के तीमारदारों को सही सीख दी है , पर उन डाक्टरों को कौन सीख देगा जिनके भीतर इन्सानियत के बचे रहने की बात कौन कहे , उनकी तो आत्मा ही जैसे मर गई है । दम तोडते मरीज और उसके तीमारदार को सान्त्वना देते समय उनकी जीभ जैसे ऐंठ जाती है , पर मौत का ऐलान करते वक्त वे दिलेर हो जाते हैं ।
कानपुर के मोतीझील चौराहे के पास अशोक नगर में स्थित बडे नाम-दाम कमाऊँ गैस्ट्रोलाजिस्ट डा. पीयूष मिश्रा भी ऐसे ही दिलेर डाक्टर हैं...। एक दिन व्यक्तिगत वाहन से गम्भीर हालत और अर्धबेहोशी में एक महिला लाई जाती है । डाक्टर से अनुरोध किया जाता है कि बाहर आकर जरा उसे चेक कर के अपनी राय दे दें । तीमारदार घबराहट में हैं , पर इतने महान डाक्टर बाहर आएँ...उनकी इज़्ज़त पर बट्टा नहीं लगेगा...? बहरहाल बहुत कहने पर कि मरीज अन्दर आने की स्थिति में नहीं है , वे दो मूर्ख-से , ढीले-ढाले से लोगों को स्ट्रेचर के साथ बाहर भेजते हैं । अर्धबेहोश महिला को वे सहायक नहीं , बल्कि उस महिला के भाई ही बडी मुश्किल से गोद में उठा कर स्ट्रेचर पर लिटाते हैं । सहायक तो गाडी और क्लिनिक के बीच की नाली के उस पार बस हाथ बाँधे खडे हैं । ज़मीन पर पडे स्ट्रेचर पर लिटाने के प्रयास में उस महिला का सिर नाली में जाते बचता है । सहायकों से जब एक बार फिर अनुरोध किया जाता है तो वे भाइयों के साथ मिल कर स्ट्रेचर अन्दर ले तो जाते हैं , पर स्ट्रेचर फिर वहाँ भी बेदर्दी से ज़मीन पर...। लगभग दस मिनट बाद डा. पीयूष मिश्रा अपने कमरे से निकल कर आते हैं , झुक कर माताजी-माताजी की पुकार लगाते हैं और फिर महिला की बडी बहन की ओर घूम कर कहते हैं , " ये बचेगी नहीं... चाहिए तो पी.जी आई ले जाइए ..."और फिर बिना कुछ और कहे-सुने बडे सधे कदमों से वापस अपने कमरे में जाकर आवाज़ लगाते हैं , नेक्स्ट...।
अर्धबेहोशी में ही महिला की आँखें थोडी खुलती हैं...शायद उसने सुन लिया हो " बचेगी नहीं...।" उसकी आँखें फिर बन्द हो जाती हैं । महिला की बडी बहन रोने लगती है । वहाँ पर आए अन्य मरीज और उनके तीमारदार उसे ढाँढस बंधाते हैं , हौसला देने की कोशिश करते हैं पर डाक्टर और नर्सें जैसे पत्थर के बुत...। दूसरे मरीजों से फीस वसूलने में लगे हैं । हिम्मत हार चुके तीमारदारों के लिए सान्त्वना के बोल से राहत पहुँचाना उनके लिए क्या बहुत भारी था ?
मानती हूँ कि तोडफोड से क्या होगा...। पर क्या ऐसे डाक्टरों को दो-तीन तमाचे रसीद करने का मन नहीं करता जिसे इतनी भी अक्ल नहीं कि तीमारदारों में से किसी को अलग ले जाकर उसे खतरे की बात बताई जाए , मरीज के सामने नहीं...। मरीज के सामने ऐसी बात बोल कर उसके जीने की जिजीविषा तोड देना कहाँ की इन्सानियत है...? डाक्टरी की पढाई के समय उन्हें नम्रता , धीरज और अन्तिम साँस तक मरीज को बचाने की कोशिश का जो पाठ पढाया जाता है , मोटी फीस वसूलते समय वह सब भूल क्यों जाते हैं...?
तीमारदार तो संयम रखेंगे पर कितना ? स्ट्रेचर पर जिस दुर्गति से महिला को ले जाकर ज़मीन पर पटक दिया गया , उस वक्त उसकी बहन अगर डाक्टर या उसके सहायक को दो-तीन चाँटे जड देती तो शायद गलत न होता...। डाक्टर क्या इन्सानियत से भी बडे हो गए हैं कि किसी असमर्थ को चेक करने के लिए बाहर भी नहीं आ सकते ?
काश ! ऐसे डाक्टरों की आत्मा उस समय भी मरी ही रहती जब उनका कोई अपना इसी तरह दम तोडने की कगार पर होता...।

Saturday, February 21, 2009

खाली बाल्टियाँ...

कविता

खाली बाल्टियाँ


मेरी माँ का नाम

लालमणि था

और,

पिता का रंगीलेलाल

मेरी माँ

मेरे पिता के भीतर

घुली हुई थी

एक

पक्के रंग की तरह

पिता का रंग सांवला था

पर चेहरा

दमकता हर क्षण

एक मणि की तरह

किसी इच्छाधारी नाग की

मणि नहीं थी- माँ

पर, इच्छाएं कैद थी

माँ की गोरी लाल हथेलियों में

माँ ने कभी नहीं चाहा

हवाएं उनकी कैद में रहें

आकाश आंचल में सिमटे

और,

समुद्र की ठंडी रेत

उनके नर्म तलुओं को सहलाए

माँ ने चाहा था

तो सिर्फ़ इतना कि-

अपने घोंसले में

वह दमकती रहे-एक मणि की तरह

लाल ईंटो वाले आँगन में

माँ की खुशियाँ

ज़िन्दगी के नलके के नीचे रखी

पीतल, लोहे और प्लास्टिक की बाल्टियों में

पानी की तरह भरी हुई थी

पर एक दिन

सूखा पड़ा-धरती फटी

बचपन में सुनी कहानी का दुष्ट राक्षस

सारा पानी पी गया

पिता,

दूर देश गए पानी लेने

और नहीं लौटे

माँ कैसे रुकती?

माँ की ज़िन्दगी जिस पिंजरे में थी

वह पिता साथ ले गए थे

और अब

ईंटो वाले आँगन मे घना अंधेरा है

उस अंधेरे के बीच

नलके की सारी बाल्टियाँ खाली हैं....