A Hindi personal blog of fiction which includes short stories and poems. Some memoirs and articles are also there written in Hindi.
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Thursday, September 30, 2010
अपनी बात
Sunday, September 19, 2010
भीतर की बाढ़
कविता
भीतर की बाढ़
अभी तक
किताबों में पढा था
फ़िल्मों में देख़ा था
और
ज़ुबानी सुना था
गाँव में जब बाढ़ आती है
उजड़ जाती है
ज़िन्दगी
चील-कौओं का ग्रास बनता
ठहरता आदमी
मौत के जलाशय में
हरी काई सी जमी निराशा
पर कहीं
आकाश में
दीप सा जला सूरज
और इन सबके बीच
एक मनुआ है...
दिदियाऽऽऽ ,
सुना है
इस बार सहर मा बाढ़ आई है
और
तटवा किनारे पूरा सहर जमा है
तब,
पता नहीं क्यों
मेरे अंदर की जंगली बिल्ली ने
अपने पंजों को खोल दिया
तट किनारे जाकर देख़ा तो भूल गई
किताबों में पढ़ी
बाढ़ की त्रासद-कथा
याद रहा तो सिर्फ़
सदियों पूर्व का जल-प्रलय
और उस प्रलय के बीच
जन्मित सृष्टि
पर आज,
तट के किनारे
प्रलय का मुँह चिढ़ाती
सृष्टि आह्लादित थी
दृश्य सटीक था और अधुनातन भी
मेरी काली आँखों का लेंस सक्रिय हो उठा
मन ने कहा,
कोई दृश्य छूटने न पाए
जर्जर झोपड़ियों में
मौत की काली परछाई सा
ठहरा अंधेरा
और,
उस अंधेरे के बीच
चीथड़ों में लिपटा
दूधिया बदन
गंदलाए फेनियल पानी में
गले तक डूबे घर
घर की छत से चिपकी
ज़िन्दगी की भीख माँगती
कातर आँखें,
पर,
उन आँखों से बेख़बर
नपुंसकों की भीड़
जब-तब किसी पाजी बच्चे सी
ताली बजा रही थी
और बच्चा?
पता नहीं किसका
गंदे पानी के भंवर में था
रुकी ताली के बीच
कोई चीख़ा
उफ़...
वह डूब रहा है
और तभी कैमरा क्लिक हो गया
ओह!
कितनी ख़ूबसूरत बात
ज़िन्दगी और मौत एक साथ?
Sunday, May 2, 2010
मैं जहाँ तक समझती हूँ जो भी व्यक्ति अपने हित के लिए पैसा खर्च करता है , वह उपभोक्ता कहलाने के दायरे में आता है , फिर चाहे वह खाने-पीने की चीज़ें हों , सुख-सुविधा का सामान हो या फिर अपनी या अपने परिवार के किसी सदस्य का इलाज कराके उसकी जान बचाने का सवाल हो…।
मिलावटी खाद्य वस्तुओं ने जिस तरह हमारी ज़िन्दगी में ज़हर घोल दिया है , उसी तरह भ्रष्ट समाज के चन्द लोग भी हमारी ज़िन्दगी से खिलवाड कर रहे हैं । उनके नाम-दाम के कारण आम आदमी उनका कुछ नहीं बिगाड पाता । इधर कुछ डाक्टर अपने कर्तव्य से इतना भटक चुके हैं कि वे डाक्टरी की पढाई के दौरान दिए गए वचन को भूल कर ज़िन्दगियों से खिलवाड कर रहे हैं । नाम-दाम से फलते-फूलते ऐसे डाक्टरों के कारण जिसके घर की ज़िन्दगी खत्म होती है , क्या उसकी कोई सुनवाई है ? जो लोग अस्पताल या डाक्टर की गलती से जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं , उनके लिए क्या प्रावधान हैं ? कानून सुधार प्रक्रिया में ऐसे मरीजों के लिए क्या कोई जगह है ? अगर नहीं तो मेरा सुझाव है कि उन्हें भी उपभोक्ता कानून का पूरा संरक्षण मिलना चाहिए…बस इतना सुनिश्चित रहे कि उस कानून का कोई दुरुपयोग न कर सके…।
Friday, April 30, 2010
जी के जंजाल ये पार्क…
Thursday, April 29, 2010
ये संस्कारहीन बुजुर्ग...
Wednesday, April 28, 2010
ये डाक्टर हैं या...
Saturday, February 21, 2009
खाली बाल्टियाँ...
कविता
खाली बाल्टियाँ
मेरी माँ का नाम
लालमणि था
और,
पिता का रंगीलेलाल
मेरी माँ
मेरे पिता के भीतर
घुली हुई थी
एक
पक्के रंग की तरह
पिता का रंग सांवला था
पर चेहरा
दमकता हर क्षण
एक मणि की तरह
किसी इच्छाधारी नाग की
मणि नहीं थी- माँ
पर, इच्छाएं कैद थी
माँ की गोरी लाल हथेलियों में
माँ ने कभी नहीं चाहा
हवाएं उनकी कैद में रहें
आकाश आंचल में सिमटे
और,
समुद्र की ठंडी रेत
उनके नर्म तलुओं को सहलाए
माँ ने चाहा था
तो सिर्फ़ इतना कि-
अपने घोंसले में
वह दमकती रहे-एक मणि की तरह
लाल ईंटो वाले आँगन में
माँ की खुशियाँ
ज़िन्दगी के नलके के नीचे रखी
पीतल, लोहे और प्लास्टिक की बाल्टियों में
पानी की तरह भरी हुई थी
पर एक दिन
सूखा पड़ा-धरती फटी
बचपन में सुनी कहानी का दुष्ट राक्षस
सारा पानी पी गया
पिता,
दूर देश गए पानी लेने
और नहीं लौटे
माँ कैसे रुकती?
माँ की ज़िन्दगी जिस पिंजरे में थी
वह पिता साथ ले गए थे
और अब
ईंटो वाले आँगन मे घना अंधेरा है
उस अंधेरे के बीच
नलके की सारी बाल्टियाँ खाली हैं....