Sunday, February 12, 2017

यह इक्कीसवीं सदी है दोस्तों...



‘कन्या-भ्रूण की हत्या करना पाप है, साथ ही कानूनन जुर्म भी...,’ ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ,’ ‘बेटियाँ घर की लक्ष्मी होती हैं...,’ इस तरह के कई नारे कभी अख़बार के पन्नों पर, तो कभी न्यूज़ चैनलों पर देखे-पढ़े जाते हैं, पर इन सबके बीच कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो इन नारों को एकदम निरर्थक साबित कर देती हैं।

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब एक ख़बर ने जितना मन को आहत किया, उससे ज़्यादा आक्रोश से भर दिया...। ख़बर थी, एक युवती को दो बेटियाँ पैदा करने के कारण ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। ऐसे विकट समय जाने किस कारण युवती ने मायके न जाकर एक मन्दिर में शरण ली और फिर दोनो बच्चियों को बेसहारा छोड़ कर मर गई...। यह कदम उसने भले ही आवेश में उठाया हो, पर उस क्षण उसकी ममता किस कोने दुबक गई थी कि उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उसके बिना उसकी मासूम बच्चियों का क्या होगा...?

स्त्री को शक्तिरूपा का नाम भी दिया गया है, पर इस तरह की कमज़ोर स्त्रियाँ इस नाम को निरर्थक बना देती हैं...। क्यों एक स्त्री मन और तन से इतनी कमज़ोर हो जाती हैं कि पति का सहारा छिन जाने पर इतनी अवश हो जाए कि उसे आगे का कोई रास्ता ही न सूझे...? अवशता के इन पलों में वह सिर्फ़ अपने लिए ही क्यों सोचती है...? ऐसी स्त्रियाँ जो खुद अपना सहारा न बन पाएँ, वे अपनी बेटियों को क्या बचाएँगी...? एक पुरुष जब अपनी मेहनत से पैसा कमा कर परिवार चला सकता है तो क्या एक स्त्री ऐसा नहीं कर सकती...?  

यह कोई पहली घटना नहीं है...। अपने देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों की आधी आबादी घरेलू व सामाजिक हिंसा से हार मान कर अपने उन कमज़ोर क्षणों में बस एक ही रास्ता चुनती है...और वह रास्ता है मौत का...। इस रास्ते को चुन कर वह तो सारी दुनियावी यंत्रणाओं से मुक्त हो जाती है, पर पीछे छोड़ जाती है कई सवाल...।

पहला और सबसे अहम सवाल तो यही है कि क्या उनके ऐसे कदम से यह पुरुष-प्रधान समाज बदल गया है...या फिर जिसकी वजह से यह रास्ता चुना है, वो पुरुष ही बदला है...? शायद नहीं...। अगर पुरुष नहीं बदलता तो न बदले...पर स्त्रियाँ तो अपने आपको बदल लें । सदियों पुरानी बात हो या आज का समय हो, अपनी बुद्धि, साहस और चतुराई से कई स्त्रियों ने पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं व परम्पराओं को चुनौती देकर अपने स्त्रीत्व को ही सार्थक नहीं बनाया, बल्कि समय को भी पलट कर रख दिया।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अत्याचार करने वाला अपराधी होता है, तो अत्याचार सहने वाला उससे भी बड़ा अपराधी है...। बरसों-बरस अत्याचार सहना ही क्यों...? बरसों बाद विरोध करने के लिए मुँह खोला तो फ़ायदा ही क्या...? जुल्म के शुरुआती दौर में ही अगर स्त्री तन कर खड़ी हो जाए तो जुल्म की इन्तिहा हो ही नहीं...। हम समाज से डर कर कब तक जीते रहेंगे...? हम अपनी आधी दुनिया की उन औरतों से प्रेरणा क्यों नहीं ले सकते जो घर, परिवार, समाज द्वारा खड़े किए गए संघर्षों और चुनौतियों से जूझते हुए...पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए अपनी मंजिल तक पहुँचती हैं...। यही नहीं बल्कि घरेलू हिंसा का डट कर मुकाबला करने वाली, मन से मजबूत बहुत सारी घरेलू औरतें भी हमको अपने आसपास दिख जाएँगी...।

आज हमें यह कहते हुए अक्सर बड़ा गर्व होता है कि हम इक्कीसवीं सदी में हैं। यह इक्कीसवीं सदी का वो भारत है, जहाँ स्त्रियों को कानूनी व सामाजिक रूप से अपनी ज़िन्दगी को अपने तरीके से जीने का अधिकार दिया गया है, पर यह अधिकार तभी सार्थक है जब एक औरत पूरी निडरता और बुद्धि के साथ इसका उपयोग करे...।

सदी दर सदी बदलती जाएगी, हम तकनीकी तरक्की के चरम पर होंगे, पर समाज का मानसिक स्तर शायद यही रहेगा। स्त्रियाँ जब तक साहस के साथ इन सब का मुक़ाबला नहीं करेंगी, तब तक उन्हें इसी तरह ठोकर लगती रहेगी। जब कई सारी महिलाएँ खुद को बदल करे आकाश की बुलन्दियों तक पहुँच गई हैं तब हम क्यों नहीं...?

इक्कीसवीं सदी की यह बुलन्दी हमारा भी इन्तज़ार कर रही है...।

Friday, February 3, 2017

किस ठाँव ठहरी है-डायन ?

अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका`विभोम स्वर' के जनवरी-मार्च 2017 में प्रकाशित मेरी यह कहानी पाठकों द्वारा बहुत सराही गई...| सो इसे अपने ब्लॉग पर भी साझा कर रही...| 





किसी व्यस्त बाज़ार में घर होने के ढेरों फ़ायदे हैं तो नुकसान भी कम नहीं हैं...। फ़ायदे की बात हो तो एक अकेलेपन का अहसास नहीं होता, दूसरे जब जिस चीज़ की ज़रुरत होती है, बस दो कदम चल कर लिया जा सकता है...। घर के नीचे ही, सड़क के किनारे ज़मीन पर ढेरों सब्ज़ीवाले बैठे होते हैं तो किनारे तरह-तरह के सामानों से लैस ठेले भी खड़े होते हैं...। आसपास कपड़े, सौन्दर्य-प्रसाधन, बर्तन और रोज़मर्रा के सामानों की दुकानें तो हैं ही...। पॉश इलाके में आखिर है क्या? दूर-दूर बने विशाल...आलीशान बँगले जिनमें रहनेवालों को अपने अड़ोसी-पड़ोसी के सुख-दुःख से कुछ लेना-देना नहीं होता, तिसपर अगर किसी चीज़ की अचानक ज़रूरत पड़ जाए तो आठ-दस किलोमीटर का सफ़र करो, तब मिलेगा सामान...। जिनके घर नौकर-चाकर और गाड़ी है, उन्हें तो तब भी सहूलियत है पर जिनके पास नहीं है, वे क्या करें...? घर की तलाश करते वक़्त अन्या अपना यह तर्क देकर विकास का दिमाग़ ही जैसे खा जाती थी, पर अब...?

आसपास चौबीसों घण्टे एक अजीब-सा कोलाहल...आते-जाते टैम्पुओं व सवारियों की चिल्लपों...आलू-मटर-गोभी लेने की गुहार...दुकानदार और ग्राहकों की तकरार और कभी-कभी सिर-फुटौव्वल...। छज्जे और दरवाज़े पर एक मिनट खड़ा होने की कौन कहे, शोर-शराबे के कारण रात बारह बजे से पहले सोना भी मुश्किल...। कभी ताज़ा हवा के झोंके से खुद ताज़ादम होने के के लिए छज्जे पर खड़ी हो भी जाती है, तो आने-जाने वालों की तीखी नज़रें उसे भीतर तक भेद जाती हैं...तिस पर सामने जो पान की दुकान है, वहाँ खड़े मनचले फ़ब्तियाँ कस कर उसे कमरे में जाने को मजबूर कर देते...।

कभी-कभी वह काफ़ी परेशान हो जाती पर अपनी परेशानी वह विकास से बाँट भी तो नहीं सकती थी। उस दिन को वह भूली नहीं है जब शिकायत करने पर विकास ने गुस्से में उसे बुरी तरह झिड़क दिया था," मुझे तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुननी...। भीड़ भरे इलाके में तुम्हीं को घर लेने का शौक़ था न, अब भुगतो...। मुझे क्या, मैं तो सुबह नौ बजे ऑफ़िस निकल जाता हूँ और सात-आठ बजे ही आता हूँ...। रही अम्मा-बाबूजी की बात, तो वह तो गाँव छोड़ कर यहाँ आना ही नहीं पसन्द करते...। कभी आएँगे भी तो देखना, इस शोर-शराबे से घबरा कर भाग ही खड़े होंगे...।" झिड़कन के बीच भी न जाने क्यों विकास को हँसी आ गई। वह खिसियाई सी खड़ी रह गई। क्या कहती विकास से...ग़लती तो उसी की थी...और उस ग़लती की सज़ा उसे ही भुगतनी होगी, वहाँ रहने की आदत डाल कर...। वह अभ्यस्त हो भी रही थी कि तभी...

दिन के यही कोई तीन-सवा तीन बजे रहे होंगे, वह खा-पीकर पलंग पर लेटी ही थी कि सहसा एक लहर की तरह उठी चीख ने उसे चौंका ही दिया। उसके घर की सीध में सड़क के उस पार सोनकर का घर था और उनकी बगल में वर्मा जी और उनके बड़े भाई का मकान था...। चीख सोनकर के घर की दीवारों को भेद कर सड़क के इस ओर तक आ रही थी। उससे लेटा नहीं गया। उठ कर छज्जे में गई तो आवाज़ और स्पष्ट हुई। कोई ज़ोर-ज़ोर से रोते हुए किसी को गाली दे रहा था। रोने-पीटने की आवाज़ से मोहल्ले के कुछ लोग वहाँ इकठ्ठा होने लगे थे। उन्हें देख कर सोनकर साहब तहमद लपेटे ही बाहर निकले और भीड़ से कुछ कह कर वर्मा जी का दरवाज़ा पीटने लगे। उन्हें ऐसा करते देख कर भीड़ भी उग्र होने लगी थी ।

वैसे भी इस बाज़ार में चलते-फिरते लोगों के कारण ऐसा तमाशा आम बात थी, पर सोनकर का यह व्यवहार उसे कुछ अजीब लगा। उस मोहल्ले में आए उसे मात्र कुछ महीने ही हुए थे। किसी को ठीक से जानती भी तो नहीं थी। बस घर के नीचे सब्ज़ी बेचने वाली माई से कभी-कभार सबके बारे में जानकारी लेती रहती थी, वह भी विकास से छिप कर...। घर के अगल-बगल दुआ-सलाम जैसा थोड़ा बहुत व्यवहार था, पर वह भी नाकाफ़ी था सबको पूरी तौर से जानने के लिए...।

सोनकर और उसके परिवार की महिलाओं को आते-जाते तो उसने देखा था। कभी-कभार वर्मा जी के भाई-भाभी भी दिख जाते थे, पर वर्मा जी और उनकी पत्नी को उसने कभी नहीं देखा था...। जब सोनकर और उनके परिचितों ने वर्मा जी का दरवाज़ा पीटना शुरू किया, तब सबका माथा ठनका...आखिर बात क्या है...?

सोनकर के घर की औरतों का रोना बदस्तूर ज़ारी था। उससे रहा नहीं गया तो छज्जे से ही उसने माई को आवाज़ दी,"माईऽऽऽ...।"

"क्या है बिटिया...?"

"क्या हो गया...? सोनकर साहब के घर में यह रोना-पीटना क्यों मचा है...? और वर्मा जी को ये लोग गालियाँ क्यों दे रहे हैं...?"

उसकी आवाज़ सुन कर माई कमर पर हाथ रख कर खड़ी हो गई,"अरे क्या बताएँ बिटिया...। सोनकर भैया की ग्यारह महीने की बिटिया थी...। खूब गोरी-चिट्टी...सुन्दर-सी...। सुबह से ठीक थी, पर दोपहर को माँ ने जैसे ही चम्मच से मुँह में दूध डाला, उसने उगल कर आँख उलट दी...। डॉक्टर को दिखाया तो पता चला प्राण तो कब के निकल गए...।" माई ने अपनी सूखी आँखों पर आँचल रख कर ऊपर उसकी ओर देखा तो वह ऊँची आवाज़ में बोल उठी,"अरे माईऽऽऽ...मैने कहीं पढ़ा था कि यह तो डिप्थीरिया के लक्षण हैं...। बच्ची की तबियत पहले से खराब रही होगी पर वे लोग समझ नहीं पाए होंगे...।"

"नहीं बिटियाऽऽऽ...ऐसा कुछ नहीं था...। अच्छी-भली थी बच्ची...।" माई के चेहरे पर घृणा की परत चढ़ गई,"अरे, अच्छी-भली बच्ची को वह हरामज़ादी वर्मा की मेहरारू खा गई...। मुँहझौंसी का बेड़ा गर्क हो...। बेऔलाद मरेगी कुतिया...। अरे, बड़ी मान-मनौती के बाद सोनकर भैया के घर लक्ष्मी आई थी...उसे भी खा गई वो कुलच्छनी...।"

माई हाथ मटका-मटका कर जिस तरह वर्मा की पत्नी को कोस रही थी, वह उसे अच्छा नहीं लग लगा पर फिर भी उसने विरोध नहीं किया। दूसरे के पचड़े या बदनामी से उसे क्या लेना-देना...। फिर अगर विकास ने उसे इस तरह माई से पूछताछ करते देख लिया तो जो नाराज़ होंगे, सो अलग...। वह चुपचाप भीतर जाने के लिए मुड़ी ही कि तभी कोई ज़ोर से चीखा,"अरे सही मौका है...। इसका मरद घर पर नहीं है...मार डाल साऽऽऽलीऽऽऽ को...।"

भीड़ में अब वर्मा के भाई-भाभी भी शामिल हो गए थे,"अरे, कितनी बार रजतवा से कहे हैं कि झोंटा पकड़ के निकाल बाहर करे ससुरी को...ऐसी कुलच्छनी को रख के काहे आफ़त मोल लेते हो, पर वो हमारी सुने तब न...। वो तो इसके परेम में अ‍इसा आन्धर है कि उसे कुछ दिख‍इए नहीं देता...। भुगते अब...हमें क्या...।"

"तो सोचना क्या फिर...आप लोग भी साथ हैं न...? आज ही इसका निपटारा कर देते हैं...।" भीड़ में से कोई चीखा,"आज सोनकर की बिटिया को खा गई...कल हमारे बच्चों पर निगाह डालेगी, क्या पता...?"

"कोई बल्लम तो लाओ...ससुर दरवाज़ा ही तोड़ देते हैं...।"

कमरे में जाने को मुड़े उसके पाँव किसी को मारने की बात से ही जैसे ज़मीन से चिपक गए...। उफ़! ये क्या हो रहा है...? एक निःसहाय औरत, जिसका पति घर पर नहीं है, जेठ-जेठानी ने साथ छोड़ दिया है, वह इस समय घर के भीतर अपनी मौत के आगम की कल्पना मात्र से किस कदर काँप रही होगी...? भीड़ जिस तरह उग्र हो रही थी, उससे उसकी मौत निश्चित है...। आखिर कोई उसकी सहायता क्यों नहीं करता...? उस बेचारी का कसूर क्या है...? कोइ किसी को कैसे खा सकता है...? यह इक्कीसवीं सदी का शहर है, फिर भी उस अकेली औरत का इस अत्याचार से कोई रक्षक नहीं...?

दुनिया में अगर कठोर लोग हैं तो कुछ सहृदय भी...। भीड़ की उग्रता देख कर कुछ लोगों ने बीच में पड़ कर उन लोगों को समझाने की कोशिश की भी तो उनको बुरी तरह झिड़क दिया गया,"क्यों बेऽऽऽ...तेरी माँ-बहन लगती है क्या...तू क्यों मरा जा रहा है...? तेरे घर का कोई मरता तो तुझे अच्छी तरह पता चलता...।" समझाने वाला इतनी फ़ज़ीहत करा के चुपचाप किनारे खिसक लिया...। दूसरे के पचड़े में अपनी गर्दन क्यों फँसाई जाए...। पगलाई भीड़ आखिर किसी की सुनती है क्या...?

"भईऽऽऽ...आज तो इस औरत को कोई नहीं बचा सकता...। इसका मरद घर होता तो वो भी नहीं...। देख नहीं रहे, लोग कितने गुस्से में हैं...।"

"अरे, वर्मा की जगह मैं होता तो खुद ही मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा देता साली को...और तब तक तमाशा देखता जब तक जल कर कोयला न हो जाती...।" भीड़ में से ही कोई गुर्राया।

घर के ठीक सामने खड़ी उग्र भीड़ की आवाज़ इतनी तीखी थी कि आते-जाते वाहनों के शोर को भी भेद रही थी। उस आवाज़ के साथ औरतों का रोना भी तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा था।

और इधर, अपने छज्जे पर खड़ी अन्या भय से काँप रही थी। आगे आने वाले दृश्य की कल्पनामात्र ने उसे दहला दिया था...। ऐसी ही एक घटना से वह बचपन में रूबरू हो चुकी थी जब उसके गाँव की रज्जो ताई को भरी भीड़ में घर से बाहर खींच लिया था। वे चीखती रही थी...लोगों से मदद की गुहार करती रही थी, पर उन्हें बचाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया...खुद उनका पति पीछे के रास्ते से भाग गया था। पूरा गाँव एकजुट होकर एक अकेली औरत की दुर्दशा का तमाशा देख रहा था। निरंकुश भीड़ में से किसी मनचले ने आगे बढ़ कर उनका कपड़ा फाड़ दिया, तो किसी दूसरे ने उनके मुँह पर कालिख मल दी और फिर उसी स्थिति में पूरे गाँव में घुमा कर उनपर मिट्टी का तेल डाल कर आग लगा दी। वह चीखती रही...रो-रो कर कहती रही...हमने कुछ नहीं किया भैया...हमें मत मारो...पर भीड़ एकदम बहरी...। राख बनती उस औरत की चीख भी राख की तरह हवा में उड़ गई। यह सब देख कर वह इतनी दहशत में आ गई थी कि बरसों घर की चौखट लाँघने में भी घबराती थी। उसकी यह हालत देख कर उसे उसकी मौसी के पास शहर भेज दिया गया। बाद में उसकी ज़िद पर शहर में ही उसकी शादी भी की गई, पर शहर...?

यह शहर भी उसके गाँव से कौन सा कम है? वहाँ रज्जो ताई थी, तो यहाँ वर्मा की पत्नी निशाने पर है...। वर्मा की पत्नी का कसूर क्या था, यह वो अभी नहीं जानती, पर रज्जो ताइ तो एकदम बेकसूर थी...। पड़ोस के लम्पट राम‍आसरे ने उसे अकेली पाकर उसकी इज्ज़त तार-तार कर दी थी और उसकी पत्नी ने पति को बचाने के लिए पूरे गाँव में शोर मचा दिया कि रज्जो ताई औरत नहीं, डायन है...जो जादू-टोने से दूसरे मर्दों को बाँध लेती है...मरद अपने होश में नहीं रहता...। बस फिर क्या था...जिन औरतों के पति रज्जो ताई की ओर आकर्षित थे, वे तो उन्हें रास्ते से हटाने के लिए पागल हो ही गई थी, उनके साथ कुछ उन मर्दों ने भी मोर्चा सम्हाल लिया था जो सिर्फ़ दिन के उजाले में ही पाक़-साफ़ थे, पर काले अन्धेरे की चादर ओढ़ कर बहुत कुछ हासिल करना चाहते थे...और रज्जो ताइ उनसे बचती आ रही थी...। मासूम रज्जो ताई का कसूर क्या सिर्फ़ इतना था कि वह एक नामर्द की पत्नी होने के साथ एक भरी-पूरी औरत भी थी...और यह औरत होना ही उनका कलंक था...? ऐसे मर्द के साथ रहते हुए खुश दिखना उनका फ़रेब था और ऐसी फ़रेबी औरत समाज के लिए ख़तरा थी...। आसपास ख़तरा मंडराए तो उससे निज़ात पाना ज़रूरी हो जाता है...। सबने निज़ात पा लिया था...। उफ़! आज शहर में भी क्या वही कहानी दोहराई जाएगी...? कोई स्त्री क्या है, इसे कोई कैसे साबित कर सकता है...? उसे अच्छा या बुरा साबित करने क हक़ इन्हें किसने दिया और उसे मारने का निर्णय सुनाने वाले ये कौन होते हैं...?

सहसा ही बचपन की वह घटना उसकी आँखों के आगे साकार हो उठी। क्या इस जालिम समाज के कारण शक़ की वेदी पर एक और औरत की बलि दी जाएगी...? उसे लगा जैसे गाँव की उस राख से रज्जो ताई बाहर निकल आई हैं और उससे मिन्नत कर रही हैं अपने को बचाने के लिए...।

रज्जो ताई की उस मर्मान्तक चीख ने उसके पूरे वजूद को कँपा दिया है...। वह लगभग तन्द्रिल अवस्था में भीतर गई, मोबाइल उठाया और सौ नम्बर डायल कर दिया...। डायल करते समय उसकी उँगलियाँ ज़रा भी नहीं काँपी...। उसे उस समय न विकास का भय था, न भीड़ की परवाह...परवाह थी तो बस एक ज़िन्दगी की, जिसे कानून के कटघरे में खड़ा किए बिना ही मौत की सज़ा सुना दी गई थी...। फोन करने के थोड़ी देर बाद उसने बाहर झाँक के देखा और सकून की साँस ली। पुलिस ने आकर न केवल भीड़ को भगा दिया था, बल्कि दो पुलिसवालों की वर्मा के घर के बाहर ड्यूटी भी लगा दी थी...। वह आकर चैन से पलंग पर लेट गई...शक़ की ज़मीन पर एक क़ब्र को बनने से उसने रोक जो दिया था...।

एक तूफ़ान तो उसने रोका था पर दूसरा तो बाकी था...। शाम को विकास आए तो बिफ़र पड़े उस पर,"क्यों, दोपहर तुमने ही फोन किया था न पुलिस को...? बहुत बड़ी समाज-सेविका बन गई हो...? मैने मना किया था न किसी के मामले में पड़ने से...। तुम्हारी इस हरकत के कारण मुझे कितना कुछ सुनना पड़ा...और यही क्यों, अब बेवज़ह सोनकर के परिवार से जो दुश्मनी हुई, सो अलग...।"

"अरेऽऽऽ...पर वे लोग उसे मार डालते न...।" विकास का गुस्सा देख कर डर के मारे सिर्फ़ इतना बोल कर उसकी आवाज़ रुँध गई।

"तो तुमने क्या सबका ठेका ले रखा है...? तुम्हारे बीच में पड़ने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा...? मौका पाकर कोई-न-कोई तो उसे मार ही देगा...। हम दिल्ली-बम्बई जैसे बड़े शहर में नहीं रह रहे अन्या...बहुत छोटा शहर है ये...। यहाँ आग फैलते देर नहीं लगती...। और एक बार तुमने ही अपने गाँव की उस घटना का जिक्र किया था न...तब बचा लिया था क्या तुम्हारे परिवारवालों ने उस औरत को...?"

गुस्से में पैर पटकते हुए विकास बाथरूम में घुस गए तो उसकी आँखें भर आई। शायद विकास भी उस भीड़ से अलग नहीं हैं...। उनके भीतर भी संवेदना का स्रोत सूख गया है...। एक औरत, जिसका पति घर पर नहीं था, उसे बचाने के लिए किसी को तो आगे आना चाहिए था न...। वह आ गई तो ऐसा क्या ग़ुनाह कर दिया कि विकास इतना गुस्सा हो गए...?

वातावरण में एक अजीब सी कड़ुवाहट घुल गई थी। उसने डबडबाई आँखों में ठहरे आँसुओं को हथेली के सोख़्ते में ही सोख लिया और फिर चाय बनाने के लिए रसोई में घुस गई। थोड़ी देर बाद चाय-नाश्ता लेकर आई तो विकास सोफ़े पर ही अधलेटे से बैठे थे। इस समय उनकी आँखों में गुस्से का एक ज़र्रा भी नहीं था बल्कि एक अजीब-सी चिन्ता झलक रही थी। उसने चाय की प्याली उनकी ओर बढ़ाई तो विकास ने हाथ पकड़ के उसे अपने पास बैठा लिया,"तुम मेरी बात समझने की कोशिश करो...। किसी की सहायता करना बुरी बात नहीं है, पर यहाँ मामला दूसरा है...। हम लोग अभी किसी को ठीक से जानते नहीं। एक-दो लोग बता रहे थे कि सोनकर ठीक आदमी नहीं है...कुछ गुंडा किस्म का आदमी है...। उससे पंगा लेना ठीक नहीं है, फिर यहाँ मौत का मामला है...उसकी बच्ची मरी है...। इस समय दुःख और गुस्से से उसका पूरा परिवार पागल है...। रही वर्मा की पत्नी की बात, उसे भी हम लोग कितना जानते हैं...?"

वह सनाका-सा खाई विकास की बात सुन रही थी कि तभी विकास ने उसे ठुनकियाया,"मेरी बात समझ में आ रही है न...?"

"अब ऐसी ग़लती नहीं होगी...।" उसने कहा तो सहज होकर विकास ने टेलीविजन ऑन कर दिया... टी.वी पर कोई नई फ़िल्म चल रही थी।

कोई और दिन होता तो विकास के साथ बैठ कर वह भी फ़िल्म देखती, पर इस समय माहौल दूसरा था...। घर के सामने एक मासूम बच्ची की मौत हुई थी और घर के मर्द उसे दफ़ना कर लौटे नहीं थे। पल भर वह चुपचाप टी.वी की तरफ़ देखती रही, फिर उठ कर रसोई में घुस गई।

उस रात दोनो से ही खाना नहीं खाया गया। उसने तो हाथ तक नहीं लगाया और विकास ने भी किसी तरह एक रोटी खाकर प्लेट किनारे खिसका दी...। बिना कुछ कहे भी उसे बहुत कुछ समझ में आ गया था...। ऊपर से कठोर दिखने वाले विकास के भीतर भी संवेदना का स्रोत सूखा नहीं था। सुबह जाकर उन्होंने न केवल सोनकर से माफ़ी माँगी, बल्कि उनकी बच्ची के लिए शोक भी जताया।

मोहल्ले में मामला लगभग शान्त हो चला था पर उसके भीतर एक अजीब सी हलचल थी। रात-दिन उठते-बैठते उसकी आँखों के सामने रज्जो ताई आकर खड़ी हो जाती। वह घबरा कर कमरे की घुटन से पीछा छुड़ाती तो बाहर सड़क के उस पार हाथ जोड़े खड़ी ताई उससे अपने को बचाने की गुहार करती मिलती...। वह इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी से घिर गई थी...। इस बेचैनी ने उसका जीना मुहाल कर दिया था...। वह समझ नहीं पा रही थी कि इससे कैसे पीछा छुड़ाए...।

दिन-ब-दिन गिरते उसके स्वास्थ्य ने विकास का ध्यान भी आकर्षित किया था। उसे शारीरिक व मानसिक रूप से व्यस्त रखने की गरज़ से ही कई कामों से विकास ने अपना हाथ खींच लिया," इधर ऑफ़िस में मुझ पर काम का बहुत बोझ है अन्या...। मैं बुरी तरह थक जाता हूँ। तुम दिन भर वैसे भी बोर होती हो अक्सर...। एक काम करो...ये घर के सौदा-सुलफ़ अब तुम ही ले आया करो...। लगे हाथ बिजली वगैरह का बिल भी भर दिया करो...।"

"ठीक है...।" छोटा-सा उत्तर देकर वह बाकी कामों में व्यस्त हो गई।

कहते हैं न कि व्यस्तता तन को तो थका देती है, पर मन के आकाश पर अगर काले बादलों-सा बोझ आ बैठता है तो बरस जाने के बाद भी अपना अंश छोड़ ही जाता है। विकास के बार-बर समझाने के बावजूद वह उस बवाली प्रकरण से खुद को अलग नहीं कर पा रही थी। जब कभी उधर नज़र जाती, सारा दृश्य फिर उभर कर उसकी आँखें नम कर देता, तिस पर नीचे सब्ज़ी वाली माई...।

वो तो जैसे आग में घी डालने का काम करती रहती...। वह जब भी सब्ज़ी लेने जाती, उसका प्रलाप चालू हो जाता,"बिटिया, कित्ते साल हुई गए सादी के...?"

"दो साल हो गए माई..." वह छोटा सा उत्तर देकर थैली में सब्ज़ी डलवाने लगती।

"कौनो बच्चा-वच्चा कियो नाही कि हुआ ही नाही...?"

"अभी किया नहीं...।"

"तब ठीक है बिटिया...पर एक बात के लिए होसियार रहना...। ऊ वर्मा की मेहरारू है न, ओसे वास्ता न रखना...। अरे, घोर अघोरिन है...। आपन जेठानी के दुई बच्चे खा गई...। जेठ पर तो जादू-टोना कर रखा है...। ऊ तो ओके देखे खातिर पागल भया रहता है...। बेचारी जेठानी कित्ता दुःखी रहती है। बड़ी मुस्किल से तो आपन मरद के सम्हाले रहत है...।"

"इसमें उस बेचारी का क्या कसूर माई...? जेठ आवारा-बदचलन होगा...। उसकी जेठानी इस बात को समझती क्यों नहीं...?"

उसने कहा ही था कि माई ने उसकी बात काट दी,"अरेऽऽऽ, आवारा-शावारा कुछ नहीं बिटिया...ई सब जादू-टोने का प्रभाव है...। अ‍इसा न होता तो उसका खुद का मरद इतने टंटे के बाद ओके छोड़ न देता...? पर नाही...आपन मरद को भी पागल कर के रखे है न...। ओकरे सिवा कौनो दीखता ही नाही...। महतारी-बाप...भैया-भौजाई...कछु नाही...। बस है तो वही मुँहझौंसी...ससुरीऽऽऽ...करमजली...। अरेऽऽऽ, इत्ते बच्चन के खाए के बाद भी निपूती ही मरेगी...।"

माई का अनर्गल प्रलाप चल ही रहा था, पर वो हर बात अनसुनी कर रही थी। इस गंवार औरत की बदज़ुबानी पर उसे विश्वास की जगह गुस्सा ही आ रहा था...। उसका तो जी हुआ कि इस बकवास के बदले वो भी उसे खरी-खोटी सुना डाले, पर विकास की नाराज़गी की बात सोच कर वह अपना गुस्सा मन में ही दबा कर आगे बढ़ गई...।

वक़्त के साथ ज़िन्दगी भी अपनी रफ़्तार पर पकड़ बनाए हुए थी, पर बावजूद इसके अक्सर उसका जी घबराने लगता...कई बार तो बहुत ज़्यादा...। उस दिन भी जब ज़्यादा ही घबराहट महसूस हुई तो घर में ताला लगा वह रिक्शा करके छः-सात किलोमीटर दूर बने पार्क में चली गई। कइयों के मुँह से उसकी तारीफ़ सुन कर यहाँ आने का तो वो बहुत बार सोच चुकी थी, पर आ कभी नहीं पाई थी...। आज सीधे उसने यहीं का रिक्शा कर लिया। निकलने से पहले उसने विकास को फोन करके पूछ लिया था। वैसे भी उस दिन वे देर से ही आने वाले थे।

सकून की तलाश में वहाँ पहुँचे हुए अभी उसे कुछ मिनट ही हुए थे कि तभी...बहन जी, नमस्तेऽऽऽ...सुन कर चौंक उठी। सामने करीब चालीस-पैतालीस बरस के एक सज्जन खड़े थे। उसे अजनबी नज़रों से अपनी ओर देखते पाकर बोले,"आप मुझे नहीं पहचानती पर मैं आपको अच्छी तरह से जानता हूँ...। मैं योगेन्द्र वर्मा...आपके घर के सामने वाले मकान में...सोनकर के बगल वाला घर मेरा है...।"

सुनते ही वह घबरा के उठ खड़ी हुई,"आप मुझे जानते हैं तो मैं क्या करूँ...? आप मुझसे क्या चाहते हैं...? इस तरह यहाँ आकर बात करने का मतलब...?"

उसकी घबराहट देख कर वर्मा भी सकपका गया," बहन जी, घबराइए नहीं...। हम लोग कोई अपराधी नहीं हैं...। मैं तो बस आपको यहाँ देख कर  धन्यवाद कहने आ गया। उस दिन अगर आप सही समय पर पुलिस न बुलाती तो वे लोग तो मेरी पाखी को मार ही डालते...।"

"पाखी...? पाखी कौन...?" वह अब भी अचकचाई हुई थी।

"पाखी...मेरी अभागिन पत्नी...जो बिना कोई अपराध किए ही अपराधी बना दी गई। क्या करूँ...कुछ समझ नहीं आता। कभी-कभी तो लगता है, यह नौकरी छोड़ कर इसे ले कहीं दूर चला जाऊँ...। पर फिर इसे खिलाऊँगा कहाँ से...यही सोच के रुक जाता हूँ...। जात-पाँत की परवाह किए बिना इससे प्यार करना और फिर शादी करना इतना बड़ा ग़ुनाह बन जाएगा, यह मैने नहीं जाना था...। अगर जानता तो खुद मर जाता, पर इसे इस तरह घुट-घुट के मरने न देता...।" कहते-कहते वो फफक पड़ा तो अन्या का मन भी भर आया," आप जी छोटा न कीजिए...इस तरह रोइए नहीं...। प्यार करना कोई ग़ुनाह नहीं...और आपने तो उसे एक पवित्र बन्धन में बाँध के उसकी सच्चाई और पवित्रता ही साबित की है...।"

घर लौटने में अन्या को अभी वक़्त था। उसे लगा कि वह कुछ करे या न करे, पर किसी इंसान का दुःख बाँट लेने में हर्ज़ ही क्या है...? वर्मा जी की बातों से उसे पता चला कि उन्होंने उस घटना के बाद सोनकर के बगल वाला अपना पुश्तैनी मकान छोड़ कर यहीं पार्क के पास एक कमरा किराये पर ले लिया है। फिलहाल कुछ दिन चैन से गुज़रे हैं। वो दोनो अभी बहुत सी बातें कर ही रहे थे कि तभी एक सुन्दर सी युवती आ कर उनके पास खड़ी हो गई,"चलिए न...बहुत देर हो गई है...।"

वह चौंक कर मुड़ी कि ठगी रह गई। ऐसा लगा जैसे अभी-अभी आकश से कोई अप्सरा उतर कर आई हो। सफ़ेद...दूधिया रंग पर तीखे नाक-नक्श...बड़ी-बड़ी कज़रारी आँखें...कद औसत, पर घुटने से नीचे तक घने-काले बाल...करीने से पहनी गई लाल बॉर्डर वाली क्रीम कलर की साड़ी...। खूबसूरती की कोई ऐसी मिसाल भी हो सकती है, यह उसने कभी सोचा भी नहीं था। वर्मा ही क्या, ऐसे रूप-सौन्दर्य पर तो कोई भी मर मिटेगा...।

"बहन जी...यह मेरी पत्नी है, पाखी...कलकत्ता की है...। इससे प्यार के मेरे अपराध के कारण इसके माता-पिता ही ने नहीं, बल्कि मेरे सगे-सम्बन्धियों ने भी हमें त्याग दिया...। बस, एक भैया ने ही नहीं त्यागा था, पर न जाने क्यों अब वो भी दुश्मन बन बैठे हैं...।"

पार्क में हल्का अन्धेरा घिरने लगा था। इस बीच वर्मा ने बहुत कुछ कह दिया था। विकास के डर से उसने उनसे दुबारा न मिलने को कहा तो डबडबाई आँखों से उसकी ओर देख कर पाखी ने बस इतना ही कहा,"दीदीऽऽऽ...मैं उस मोहल्ले में अब कभी नहीं आऊँगी...आपसे भी नहीं मिलूँगी, पर एक बात कहना चाहती हूँ...फिर मौका मिले न मिले...। दीदीऽऽऽ...मैने कुछ नहीं किया है। शादी के पाँच साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ तो इसमें मेरा क्या कसूर...? मैने किसी के बच्चे को नहीं मारा...भला मैं क्यों मारूँगी...? मेरी जेठानी ने जाने क्यों मेरी ऐसी बदनामी कर दी है कि किसी भी दरवाज़े पर फूल, चावल, बताशा कोई और रखता है और नाम मेरा लग जाता है...। मैं क्या करूँ...? मुझपर विश्वास कीजिए। मुझे जादू-टोना कुछ नहीं आता...। मैं तो...।" आगे वह बोल नहीं पाई, बस फफक कर रो पड़ी...।

उसे इस कदर रोता देख कर वह इतना घबरा गई कि उसके मुँह से सांत्वना के दो बोल भी नहीं फूटे। विकास के आने का वक़्त हो गया था। इसलिए वह उनसे विदा ले बड़ी तेज़ी से घर आ गई। घर आकर वह इस तरह काम में मशगूल हो गई जैसे कभी किसी से मिली ही न हो...।

विकास से छिप कर तो उसने बहुत कुछ कर लिया था पर अपने आप से कैसे छिपती? दिन भर तो काम में उलझी रहती थी पर रात में...? पाखी की याचनाभरी आँखें या तो सारी रात जगाती या गहरी नींद में भी झकझोर देती,"दीदीऽऽऽ...मुझसे नफ़रत न करना...। मैंने कुछ नहीं किया है...। मुझ अभागिन की गोद नहीं भरी तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं दूसरों की गोद सूनी करूँगी...।"

पाखी की रुँधी आवाज़ देर तक उसका पीछा करती और वह न चाहने पर भी अक्सर चीख उठती,"उसे छोड़ दो...उसे मत मारो...उसने कुछ नहीं किया...।"

जब कई बार उसने ऐसा किया तो विकास चिन्तित हो गए,"क्या हो गया है तुम्हें...? सामने ऐसा-वैसा देख लिया तो उसे दिल से ही लगा बैठी...?" उसने विकास की किसी बात का उत्तर नहीं दिया, पर उसकी आँखों के नीचे बढ़ते काले घेरे और गिरते स्वास्थ्य से घबरा कर विकास ने गाँव से अपनी माँ को बुला लिया।

माँ ने सारी बात सुनी तो उसको गाँव ले जाने की ज़िद करने लगी पर वह जाती कैसे? रज्जो ताई की आँखों ने भी कहाँ अब तक उसका पीछा छोड़ा था...। नौकरी के सिलसिले में विकास भले ही शहर में बस गए थे, पर उनका घर भी तो उसके मायके जैसा गाँव ही था। रज्जो ताई अपने पूरे वजूद के साथ उसकी आत्मा में इस कदर बस गई थी कि शादी के बाद उसने ससुराल के गाँव की ओर भी कभी कदम नहीं रखे। जब कभी एक-दूसरे की याद आती तो अम्मा-बाऊजी ही आ जाते शहर...उससे मिलने...।

अम्मा ने आकर बहुत कुछ सम्हाल लिया था। गृहस्थी फिर अपनी रफ़्तार से चलने लगी थी। दिन भर अम्मा के साथ लगे रहने से छज्जे पर उसका जाना कम हो गया था...लगभग न के बराबर, पर एक दिन सहसा ही, जब भोर की उजास पूरी तरह फूटी भी नहीं थी कि बाहर के भीषण शोर ने सबके साथ-साथ उसे और विकास को भी हड़बड़ा कर जगा दिया था। वे दोनो छज्जे पर गए तो बाहर का दृश्य देख कर चौंक गए। सोनकर के घर के बाहर पुलिस की जीप खड़ी थी। दस-पन्द्रह पुलिसवालों ने सोनकर और वर्मा के भाई के घर को घेर रखा था। उनके सम्बन्धी हंगामा कर के शोर मचा रहे थे, पर पुलिस ने अपनी कार्यवाही नहीं रोकी। घर में घुस कर सोनकर और वर्मा के भाई को घसीट कर बाहर ले आई और जीप में पटक दिया,"सालोंऽऽऽ...हरामज़ादोंऽऽऽ...बहुत बड़े गुण्डे हो तुम लोग...? पुलिसवालों से ज़ोर-आजमाइश करते हो...? थाने चल...फिर बताता हूँ, किसमें कितना दम है...।"

सोनकर लगातार चीख रहा था,"बिना सबूर्त के तुम लोग किसी को ऐसे गिरफ़्तार नहीं कर सकते...। पहले जुर्म साबित करो, फिर जो करना है करो...।"

"सबूत भी मिल जाएगा साऽऽऽले...हरामखोर...। जिसके साथ ग़लत किया है न...उसी के मरद ने चीख-चीख कर तुम दोनो का नाम लिया है...।" दरोगा ने एक ज़ोरदार तमाचा मारा तो दोनो सन्नाटे में आ गए...।

सामने का यह दृश्य देख कर अन्या सन्नाटे से ज़्यादा दहशत में आ गई थी...। कुछ-कुछ उसकी समझ में आ रहा था। पुलिस की जीप चली गई तो बतकही का दौर शुरू हो गया। उसके घर के नीचे उसके सारे पड़ोसी इकठ्ठा थे। खरे साहब पान-मसाला चबाते हुए कहा,"उसक यह अंजाम तो होना ही था न...। दरोगा बता रहा था कि पार्क के पीछे जो घनी झाड़ियाँ हैं, वहीं उसकी लाश मिली है...क्षत-विक्षत और निर्वस्त्र...। शायद आठ-दस लोग थे...। बलात्कार तो किया ही...दुर्दशा भी बहुत कर दी...।"

"अरेऽऽऽ...वो तो डायन थी भैया...डायन...। डायन को अपने कर्मों की सज़ा तो मिलनी ही थी न...मिल गई...। मरी तो बहुत बुरी मौत है...।"

"पर भैयाऽऽऽ...बेचारा उसका आदमी तो जैसे बेमौत मर गया...। कोई बता रहा था...पगला गया है एकदम...। उस डायन की लाश गोद में लेकर बैठा है...। छोड़ कर उठ ही नहीं रहा...। पोस्टमार्टम के लिए भी ले जाने नहीं दे रहा था...।"

"अरे, छोड़ेगा कैसे...? मरने के बाद भी डायन ऐसे ही जकड़े रहती है...। देखना...लिख कर रख लो मेरी बात...वो उसको भी अपने साथ ले जाकर ही मानेगी...।"

"अरे मैं तो कहता हूँ, ले ही जाए तो ज़्यादा अच्छा...। इतनी बदनामी झेल कर कोई कैसे जी पाएगा...? तिस पर औरत की अस्मत लुटी तो समझो सब कुछ लुट गया...।"

"मैं क्या करूँ दीदी, इसे समझा-समझा के हार गया पर यह है कि मानती ही नहीं...। बच्चे के लिए पगलाई रहती है। दिन-रात पूजा-पाठ...मन्दिर-मस्जिद के चक्कर लगाना...। किसी का बच्चा देखती है तो लपक पड़ती है...। इसे यही समझाता हूँ कि जब अपनी किस्मत में औलाद का सुख न हो तो दूसरे का देख कर ललचाया भी न कर...और फिर वैसे भी जब इसपर बाँझ का ठप्पा लगा ही है, तो लोग तो अपनी औलाद इससे दस गज़ दूर ही रखेंगे न...।"

"दीदीऽऽऽ...मैं बाँझ ज़रूर हूँ, पर मेरे भीतर बहुत ममता भरी हुई है...। मैं किसी के बच्चे को कैसे नुकसान पहुँचा सकती हूँ...। आप तो मेरा विश्वास करेंगी न दीदी...? मुझ पर विश्वास करना दीदी...।"

सहसा, पाखी की कातर आवाज़ उसके भीतर उथल-पुथल मचाने लगी। उसकी आँखों के आगे हल्का अन्धेरा घिरने लगा और तन...लगा, जैसे नसों में बहते खून ने अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी हो...। विकास को झिंझोड़ते हुए वह चीखी,"वह निर्दोष है...उसे बचा लो...।"

"अन्याऽऽऽ...होश में आओ...। वह मर चुकी है...। अपने आप को सम्हालो तुम...।" विकास की आवाज़ उसके सुन्न होते कानों तक नहीं पहुँची और वो जब तक उसे सम्हाल पाता, वह धम्म से छज्जे पर ही गिर पड़ी।

थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया तो वह अन्दर बिस्तर पर थी...। एक अजनबी, जो शायद डॉक्टर था, उसके ऊपर हल्का-सा झुका पूछ रहा था,"अब कैसा महसूस कर रही आप...?"

उसने उत्तर नहीं दिया। बस फटी-फटी आँखों से सबको देखती रही...। अम्मा और विकास के चेहरे पर उगी चिन्ता की रेखाओं को वह स्पष्ट देख रही थी, पर समझ नहीं पा रही थी कि वे सब इतने परेशान क्यों हैं...? उसकी तबियत तो अक्सर खराब होती रहती है, तो इस बार क्या हुआ?

उसने उठने की कोशिश की तो डॉक्टर ने उसे थपथपाया,"अभी लेटी रहिए..." और फिर विकास को लेकर बाहर चला गया।

सहसा उसे बेहद कमज़ोरी महसूस हुई और आँखें फिर मुंदने लगी...। थोड़ी देर बाद उसे नहीं पता कि वह सोई कि नहीं, पर जब उठी तो उसके भीतर एक अजीब-सी आग जल उठी...। उसके पायताने सब्ज़ी वाली माई बैठी हुई थी। वह उसके पाँवों को सहला रही थी कि तभी उसने चीखते हुए एक भरपूर लात उसकी छाती पर मारा,"नीच औरतऽऽऽ...उसे बदनाम करने में तेरा भी कम हाथ नहीं था...।"

सब लोग हक्का-बक्का रह गए। अपनी छाती को पकड़े माई काफ़ी दूर जाकर गिरी,"हाय दैय्या रे दैय्याऽऽऽ...बहुरिया तो हमको मार डाली रेऽऽऽ...हम तो भला करने आए थे...और ई हमको लात मारी...।"

घबरा कर अम्मा ने दौड़ कर उसे उठाया और छाती सहलाते हुए बोली,"बुरा मत मानो माई...बहू अपने होश में नहीं है...। तुम्हारे सामने ही तो डॉक्टर गया है न...।"

माई ने सहसा ही चीखना बन्द कर दिया,"अब बुरा मान के क्या करना है अम्माऽऽऽ...। हम तो पहिले ही कह रहे थे कि उस डयनिया ने बहुरिया के भीतर पूरी तरह कब्ज़ा जमा लिया है...। ई लात इसने नहीं, उस डायन ने मारी है...।"

"इसे अन्दर किसने आने दिया...? यह दुबारा दिखी तो मैं इसे मार डालूँगी...।" दहाड़ते हुए वह बुरी तरह हाँफ़ गई। अम्मा उसे शान्त करते हुए सम्हालने में लग गई तो माई ऐसे भागी कि पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा...।

थोड़ी देर बाद जब विकास आए तो सारी घटना सुन कर परेशान हो गए...। बहुत प्यार से उसक माथा सहलाते हुए, उसे फुसला कर उन्होंने किसी तरह उसे दव खिलाई तो थोड़ी ही देर में वह दुबारा जैसे नीम बेहोशी में चली गई...। अम्मा और विकास लगातार उसके पास बने रहे, चिन्ता से लबरेज़...। उनके साथ-साथ घर भी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था...।

उसे पूरी तौर से सोया जान कर विकास ने धीरे से अम्मा को किनारे आने का इशारा किया। विकास कुछ कहते कि उससे पहले अम्मा ही बोल पड़ी,"मैं जानती हूँ बेटा कि डॉक्टर ने क्या कह है...। यही न कि इसे बहुत गहरा सदमा पहुँचा है...दवा से ठीक हो जाएगी...। पर बेटा, इस तरह दवा खाकर यह दिन भर सोती ही रही तो ठीक कैसे होगी...? तुम मानो न मानो...पर मुझको माई की बात पर यकीन हो रहा...। ज़रुर उस डायन ने इस पर कब्ज़ा कर लिया है...वर्ना कभी देखा है कभी इसको ऐसा कुछ करते...?"

"पर माँ..." विकास माँ की बात को काट नहीं पा रहे थे।

"मैं जानती हूँ कि तुमको इन सब बातों पर भरोसा नहीं...। तुम डॉक्टर की दवा करते रहो...मैं कब मना कर रही हूँ, पर मुझे भी अपना उपाय करने दो...देसी उपाय...। बचपन में जब तुम नज़रा कर बुरी तरह बीमार पड़ जाते थे, तब उस देसी उपाय से ही ठीक होते थे...। बस एक बार बहू के लिए भी कर लेने दो...।"

विकास चुप हो गया। माँ की आँखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास था।

वक़्त बड़ी तेज़ी से बीतता है, पर इस घर में तो जैसे वक़्त थम-सा गया था...। विकास ने अन्या के माँ-बाऊजी को भी गाँव से बुला लिया था...। वे भी विकास की माँ के साथ-साथ ओझाओं और पंडितों से सलाह-मशविरा कर रहे थे।

कुछ दिन बाद ठहरे हुए वक़्त ने हल्की सी करवट ली। उस दिन उसकी तबियत और दिनों की तुलना में थोड़ी बेहतर लग रही थी। माँ ने उसे नहला-धुला कर कपड़े बदले और शैम्पू किए हुए बालों को यूँ ही खुला छोड़ दिया। पलंग पर वापस न लेट कर वह सोफ़े के बैक पर सिर टिका कर बैठ गई। कमज़ोरी इतनी आ गई थी कि आँखें अपने आप मुँदने लगी, पर नींद से ऊबी हुई वह जबरिया उन्हें खुला रखने की कोशिश कर रही थी।

इस कोशिश के बीच सहसा ही उसकी आँखें फैल सी गई। सामने लाल किनारी वाली साड़ी पहने, खुले बालों के साथ विकास की माँ खड़ी थी। उनके हाथ में बड़ी-सी थाली थी जिसमें ढेर सारे फूल, चावल, लाल ईंगुर और सरसों के दानों के साथ आटे की बनी अजीब-सी आकृति थी। वे उसके चारों ओर फेरे लगाते हुए मुँह में कुछ बुदबुदा रही थी...। जाने क्यों उनकी आँखें हल्की सी लाल हो रही थी। अन्या ने अम्मा का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था...।

उसे समझ नहीं आया कि सासू माँ को यह क्या हो गया है...? कहीं सच में वे भी तो...? उसकी आँखों के आगे हल्का अन्धेरा-सा छाने लगा, पर उस अन्धेरे के बीच एक अजीब सी रोशनी और गन्ध थी...। अचानक उसे लगा, भीड़ ने अम्मा को भी डायन समझ लिया है...जादू-टोना करने वाली डायन...। तो क्या पाखी के बाद अब अम्मा की बारी है...?

अम्मा विकास से कह रही थी,"आज रात को बारह बजे जाकर इसे बिल्कुल बीच चौराहे पर पर रख आना...और तुरन्त वापस चल देना...। बस ध्यान रखना, कुछ भी हो, पीछे मुड़ कर न देखना...। बाबाजी ने कहा है, कल सुबह बहू बिल्कुल ठीक होकर उठेगी...।"

"अम्माऽऽऽ..." वह पूरी ताकत से चीखी थी। अन्धेरा पूरी तरह से घिरने लगा था उस अहसास का लबादा ओढ़ कर...। वो साफ़ देख रही थी...निर्वस्त्र, जलती हुई अम्मा को भीड़ ने घेर रखा था और वे सबसे दया की भीख माँग रही थी...। थर-थर काँपती अन्या ने एक भयानक चीख के साथ अम्मा की पकड़ी हुई थाली पर एक भरपूर हाथ मारा। थाली में रखा सारा सामान कमरे में बिखर गया...।

अम्मा खाली हाथ हक्का-बक्का खड़ी थी। विकास हतप्रभ थे और अन्या की माँ ज़ार-ज़ार रो रही थी,"रज्जो ताई की परछाई से बचा कर बिटिया को सहर मे ब्याहे थे, पर हमको का पता था कि सहर में भी डायनें होती हैं...। इसने तनिक उससे एक-दो बार बोल का लिया, ऊ डायन तो इसके भीतर ही ठहर गई...।"


                                       

 (चित्र गूगल से साभार)


























Wednesday, January 18, 2017

गज़ब ज़िन्दगी-अजब ज़िन्दगी

          
 सुबह नींद की ख़ुमारी पूरी तरह टूटी भी नहीं थी कि फोन की घण्टी घनघनाई। रिसीव किया तो उधर से आवाज़ आई,"तुम्हें पता है दीदी...नारायण मौसा नहीं रहे...। आज सुबह ही उन्होंने अन्तिम साँस ली है...।"

आश्चर्य...सुन कर कोई प्रतिक्रिया नहीं...। न हैरानी...न दुःख...बस एक हल्का-सा उच्छवास...अच्छा हुआ, खुद मुक्त हो गए और साथ ही दूसरों को भी मुक्त कर दिया...। एक शतक पार कर चुके मौसा जी का रहना-ना रहना बराबर था...। पूरी तरह अशक्त हो चुके मुर्दा-से शरीर को वे बस ढोये जा रहे थे। उनके बेटे उनकी अशक्तता के बोझ से घबरा कर अक्सर कहते,"इनके कारण तो कहीं आना जाना दुश्वार है। ना किसी की खुशी में शामिल हो सको और ना किसी के गम में शरीक हो सको...। यह भी क्या जिंदगी है...।" बड़े बेटे-बहू ने साफ इंकार कर दिया,"मैं इनका बोझ नहीं ढो सकता...। हम लोगों को खुद किसी के सहारे की जरूरत है, इन्हें क्या सहारा देंगे...?"

उनका यह कहना तर्कसंगत था। दो-दो बार हार्टअटैक झेल चुके, खुद सत्तर का अंक पार कर चुके भैया का यह कहना ठीक भी था और नहीं भी...। नहीं इसलिए कि मां-बाप किसी कारण से अशक्त होने के बावजूद अपने बच्चों को त्यागते नहीं...खुद परेशान रहकर भी उनके लालन-पालन को बोझ नहीं समझते, फिर अपनी अशक्तता के क्षणों में एक बच्चे सरीखे हो चुके अपने मां-बाप को हम बोझ क्यों समझते हैं...? खैर! आज के इस तरक्कीपसंद युग में या बड़ी साधारण सी और आम बात हो गई है...। बड़े बेटे के इनकार पर छोटे बेटे-बहू के कंधो पर यह  बोझ आ गिरा तो दोनों ही मजबूर जिंदगी जीने लगे...। नारायण मौसा को तरह-तरह की बीमारी थी |  पैर सूज कर इस तरह दुखता कि चलना फिरना दुश्वार हो जाता...नित्य क्रिया के लिए उठना भी मुश्किल...। साफ-सफाई के बावजूद उनका कमरा एक अजीब तरह की दुर्गंध से भरा रहता...। एक नारकीय जीवन जीते हुए वह अपने एकांतवास से इस कदर घबरा जाते कि अक्सर चुपके से मौका पाकर पैर घिसटते हुए घर से बाहर निकल कहीं दूर चले जाते...। फिर क्या, पता चलते ही उनकी ढुँढाई शुरु होती...। बड़ी मुश्किल से वह मिलते तो बेटा एकदम बौरा जाता,"हम लोगों के जाने के बाद ही आपको जाने का इरादा है? पूरे निन्यानबे साल के हो गए हैं, अब मुक्त क्यों नहीं हो जाते...?"

सुनकर एक सन्नाटा पसर जाता...बाहर भी और नारायण मौसा के भीतर भी...। मौत क्या मेरे हाथ में है...? आखिर मैं ज़िन्दा क्यों हूँ...? कौन सा पाप किया था, जो मैं इस नरक में हूँ...? पत्नी पुण्यात्मा थी, पचास में ही चल दी...। काश ! मैं भी चला जाता...। बेटा बड़बड़ा कर चला जाता तो वह एकांत में फूट-फूट कर रोते, चुप होते...अपनी जिंदगी का लेखा-जोखा करते और फिर बिना खाए पिए सो जाते। उनके उस दर्द की सुनवाई कहीं नहीं थी। ना इस जीते जागते संसार में और ना उस ऊपरी जगत में...। दूसरे के फटे में टांग अड़ाने का रिवाज हमारी दुनिया में नहीं है और ना किसी में हिम्मत है बोझ बाँटने की...। हर इंसान अपनी जिंदगी को पहले नंबर पर रखता है...। दूसरों की जिंदगी कहाँ जा रही है, उसे जानकर या उस में कूद कर वह ना किसी से रिश्ता बिगाड़ना चाहता है और ना उस बेवजह के बोझ को अपने कंधे लादने की बेवकूफी करना चाहता है...। जो ऐसा करते हैं वह बिरले हैं और उंगलियों पर गिने जा सकते हैं...। खैर! किसी तरह नारायण मौसा ने अपनी जिंदगी का शतक पार कर ही लिया और अपनी तड़पती, लरजती जिंदगी को बाय कहकर खुद ही मुक्त नहीं हुए बल्कि अपने उस भरे पूरे परिवार को भी मुक्त कर दिया।  सौ साल पूरे कर के जाने वाले नारायण मौसा के मरने का दुख किसी को नहीं था...। दुख पर गर्व भारी पड़ गया था। आखिर पोते-पड़पोते का मुंह देख कर जाने वाले कितने होते हैं...? कितने लोग इतनी लंबी उम्र पाते हैं...? बड़े भाग्यवान थे, इतना बड़ा भरा-पूरा परिवार पीछे छोड़ कर गए हैं। हर कोई उनका पैर छूकर आशीर्वाद ले रहा था,"बाबाऽऽऽ, मुझे आशीर्वाद दो, मैं भी आपकी तरह पोते-पड़पोते ही नहीं बल्कि उससे भी आगे की पीढ़ी देखने के लिए जिंदा रहूँ...। पड़पोती ने अपनी दो माह की बच्ची को भी उनके चरणों में डाल दिया," परबाबा का आशीर्वाद लो बिटिया...।" किसी की आँख में आँसू की एक बूंद नहीं...बाबा स्वर्ग जा रहे हैं...। अर्थी पर उनका निर्जीव तन रखते ही चारों तरफ से फूल बरसने लगे...। गेंदे के फूल की बड़ी-बड़ी मालाओं ने उनका पूरा जर्जर तन ढँक लिया...। हरे राम की ओढ़नी के नीचे उनका बीता हुआ नारकीय जीवन कहीं दुबक गय...। बाहर बैंड बाजा बजने लगा और फिर ‘राम नाम सत्य’ का उद्घोष किसी हाहाकार की तरह उठा और ढेरों गाड़ियाँ उनकी अर्थी के पीछे चल दी, घाट की ओर, उन्हें अंतिम विदाई देने...। आंखों के आगे से अर्थी ओझल हो गई और साथ ही बैंड बाजा की सुरीली आवाज भी...पर पीछे छोड़ गई  ऐसे अनसुलझे सवालों  को, जो सदियों से इंसान का पीछा कर रहे हैं, पर आज तक कोई भी उसका हल नहीं निकाल पाया...।

यह सारे सवाल जिंदगी से ही जुड़े हुए हैं...। आखिर क्या है जिंदगी? कितने रंगों से रंगी हुई है जिंदगी...? कहीं बच्चे बोझ बन जाते हैं, तो कहीं माता पिता...। हर जिंदगी अलग-अलग खानों में क्यों बँटी हुई है? एक इंसान झोपड़पट्टी में रहते हुए कई बार अपने बेटों का पेट भरने के लिए खुद भूखा सो जाता है...। पीठ पर बोरी लाद कर ट्रक पर चढ़ाता है और हाथ में आए चंद रुपयों को जोड़ कर अपने बेटों को पढ़ा कर बुलंदी पर पहुंचाता है...। बेटों को इस लायक बनाता है कि वह आलीशान बंगलों में रह सके, मोटरगाड़ी का सुख उठा सके, अपने रुतबे के चलते अपने बच्चों का ब्याह ऊँचे घरानों में कर सकें और उन्हें आसमान छूने का हौसला दे सके...पर उन्हें यह सब देने के बाद वह दाता इतना खाली कैसे हो गया...? लुटाते लुटाते झोली भी खाली हो जाती है, यह तो सुना था पर हृदय में भरी भावनाएं कैसे खाली हो जाती हैं... इसे आज की दुनिया में शिद्दत से महसूस किया जा सकता है...।

कहते हैं कि इंसानी जिंदगी बड़ी मुश्किल से मिलती है और हर मायने में वह दूसरी जिंदगियों से इतर बेहद गजब की है, पर उस गजब की जिंदगी को हम इंसानो ने अपने स्वार्थ के चलते क्या अजब सी नहीं बना दी है...?