काथम

A Hindi personal blog of fiction which includes short stories and poems. Some memoirs and articles are also there written in Hindi.

Saturday, February 21, 2009

खाली बाल्टियाँ...

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कविता खाली बाल्टियाँ मेरी माँ का नाम लालमणि था और, ...
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माँ कहाँ नहीं हैं ?

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कविता माँ कहाँ नहीं हैं? मैं, कैसे मान लूँ माँ- अब नहीं हैं ...
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Thursday, February 19, 2009

किस जगह खड़ी है औरत...

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(किश्त-पांच ) किसी बात की गहराई में जाने के लिए व्यक्ति का बहुत पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं। कम पढ़ा-लिखा या अनपढ़ इंसान भी पूरी ...
Monday, February 16, 2009

हाशिया.....

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( किश्त-चार ) दुनिया की यह बात सौ प्रतिशत खरी है कि औरत एक ऐसी पहेली है जिसे कभी सुलझाया नहीं जा सकता, पर इसके स...
Sunday, February 15, 2009

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(किश्त-तीन ) हमारा हाथी रूपी दोगला समाज इतना ज़्यादा चालाक हो चुका है कि उसे पकड़ पाना हर किसी के वश की बात नहीं। वह दिखाने के लिए स्त्री-वर...
Wednesday, February 11, 2009

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( किस्त-दो ) हम पुराने समय की बात छोड कर आज नए ज़माने की ओर देखें जब हम इक्कीसवीं सदी में हैं। यह नई सदी एक विशालकाय "घर" की ऐसी ...
1 comment:
Wednesday, February 4, 2009

हाशिए पर औरत

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( किश्त-एक ) कहा जाता है की स्त्री दुनिया की सब से खूबसूरत , अनोखी और सबल रचना है| स्त्री न होती तो दुनिया भी संरचित न होती| अकेला पुरुष उसक...
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कुछ मेरी बात

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प्रेम गुप्ता `मानी'
रेगिस्तान की गर्म...तपती-बलुई ज़मीन पर नंगे पाँव चलने की मजबूरी कैसी होती है, यह तो वही बता सकता है जिसके पाँव में छाले हों। यह छाले जब फूटते हैं तो एक अजीब सी टीसन देते हैं। इस टीसन से घबरा कर ज़िन्दगी कभी किसी अन्धी खाई की ओर जाने लगती है, तो कभी किसी रोशनी से रूबरू होकर एक नई दिशा की ओर मुड़ जाती है। मैने ज़िन्दगी को दर्द के इसी आइने में देखा है...। यह दर्द जब स्याही बन कर कागज़ पर छलका, तब कुछ कहानियों ने जन्म लिया। रही बात कविताओं की...तो वो जन्म ही कहाँ लेती हैं...वो तो उन्मुक्त नदी सी बस बह निकलती है, हर बंधन से आज़ाद...
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