Sunday, May 8, 2011

एक समन्दर - माँ के अन्दर


आज मातृ-दिवस के पावन अवसर पर दुनिया भर की सभी ममतामयी माँओं को मेरा प्रणाम...|


कविता
                     एक समन्दर - माँ के अन्दर


               माँ के भीतर
               एक बहुत बड़ा समन्दर था
               माँ,
               नहीं जानती थी
               पर, हम भाई-बहन
               वहाँ खूब धमा-चौकड़ी करते
               कभी घुटनो तक पानी में उतर जाते
               तो कभी आती-जाती लहरों को
               भाग-भाग कर थका डालते
               कभी
               गीली...गुनगुनी रेत का
               घरौंदा बनाते
               और फिर झगड़ कर तोड़ देते
               समन्दर के किनारे बिछी ढेरो रेत से
               हम सीपियाँ इकट्ठी करते,
               उन्हें खोलते...कुरेदते
               सीपी के अंदर बंद कोई
               धीरे से चिहुंकता
               हम नहीं जानते थे
               कि वह चिहुंकन माँ की थी
               हम उस चिहुंकन को भूल
               समन्दर में फिर ठिठोली करते
               एक युग जैसे
               समन्दर के सामने टँगे सूरज का
               मुँह चिढ़ाता 
               और,
               हमें किसी और की तलाश थी
               माँ के समन्दर की मछलियाँ
               कभी दिखी नहीं
               पर हम माँ से अक्सर पूछते
              "हरा समन्दर...गोपीचन्दर
               बोल मेरी मछली...कित्ता पानी?"
               माँ की सूनी आँखों में
               पूरा-का-पूरा समन्दर उतर जाता
               और उसकी गहराई में 
               बसी धरती
               पानी के नर्म अहसास के बावजूद
               पूरी तरह चटक जाती
               पर हम
               उसकी चटकन से बेख़बर
               उसके छिछले तट पर ही अठखेलियाँ करते
               थक-हार कर माँ
               समन्दर को धीरे से
               तलहटी में उतार देती
               ताकि,
               उसके बच्चे खेल सकें 
               एक मासूम सा खेल...।

10 comments:

  1. बहुत खूबसूरती से माँ के अन्दर समंदर की बात कही है ...

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  2. बेहद गहन और मार्मिक चित्रण कर दिया।

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  3. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (9-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. bhut bhut hi sunder abhivakti maa ki... happy mothers day....

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  5. कितनी प्यारी कविता ...प्यारा चित्र .....सभी प्यारी प्यारी ममाओं को हैप्पी मदर्स डे

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  6. माँ की सूनी आँखों में
    पूरा-का-पूरा समन्दर उतर जाता
    और उसकी गहराई में
    बसी धरती
    पानी के नर्म अहसास के बावजूद
    पूरी तरह चटक जाती
    पर हम
    उसकी चटकन से बेख़बर
    उसके छिछले तट पर ही अठखेलियाँ करते
    थक-हार कर माँ
    समन्दर को धीरे से
    तलहटी में उतार देती
    ताकि,
    उसके बच्चे खेल सकें
    एक मासूम सा खेल...।


    हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ लिखी हैं आपने.....बहुत ही सुंदर

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  7. माँ को प्रणाम!
    मातृदिवस पर बहुत सुन्दर रचना लिखी है आपने!
    --
    बहुत चाव से दूध पिलाती,
    बिन मेरे वो रह नहीं पाती,
    सीधी सच्ची मेरी माता,
    सबसे अच्छी मेरी माता,
    ममता से वो मुझे बुलाती,
    करती सबसे न्यारी बातें।
    खुश होकर करती है अम्मा,
    मुझसे कितनी सारी बातें।।
    --
    http://nicenice-nice.blogspot.com/2011/05/blog-post_08.html

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  8. भावपूर्ण, माँ को समर्पित सुन्दर रचना....

    माँ तो माँ है .....इससे बढ़कर कोई नहीं

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  9. माँ की सूनी आँखों में
    पूरा-का-पूरा समन्दर उतर जाता
    और उसकी गहराई में
    बसी धरती
    पानी के नर्म अहसास के बावजूद
    पूरी तरह चटक जाती.

    बहुत सुन्दर रचना.

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  10. aapki shabdon ko ek sutr me pirone ki kala darshniya hai ek khas baat jo ek kavita ko kavita batati haiwo hai sahi shabd se prarambh karna aur uchit shabd par samapt karna jo aapke yahan hai....aadil rasheed

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